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इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार और डिजिटल साक्षरता

इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार और डिजिटल साक्षरता

   Best Coaching Classes    09-10-2019

इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार और डिजिटल साक्षरता

इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार और डिजिटल साक्षरता

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में ‘इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार’ पर चर्चा की गई है। साथ ही इसमें इंटरनेट के महत्त्व और डिजिटल साक्षरता का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ
डिजिटलीकरण के दौर में इंटरनेट संचार और सूचना प्राप्ति का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ज़रिया बन गया है। दशकों पूर्व इंटरनेट तक पहुँच को विलासिता (Luxury) का सूचक माना जाता था, परंतु वर्तमान में इंटरनेट सभी की ज़रूरत बन गया है। इंटरनेट की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हाल ही में केरल उच्च न्यायालय ने फहीमा शिरिन बनाम केरल राज्य के मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आने वाले निजता के अधिकार और शिक्षा के अधिकार का एक हिस्सा बनाते हुए इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया है।

क्या है मामला?
केरल के कोझीकोड में पढ़ने वाली एक छात्रा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पीवी आशा ने इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया है।
उल्लेखनीय है कि छात्रा को उसके कॉलेज हॉस्टल से इसलिये निष्काषित कर दिया गया था, क्योंकि वह हॉस्टल में प्रतिबंधित समय के दौरान मोबाइल फोन का प्रयोग कर रही थी। छात्रा ने इसी विषय को केरल उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी थी।
याचिकाकर्त्ता ने यह भी दावा किया था कि इस प्रकार का प्रतिबंध लिंग के आधार पर भेदभावपूर्ण था, क्योंकि यह लड़कों के छात्रावास में समान रूप से लागू नहीं था।
इंटरनेट का महत्त्व
इंटरनेट संचार हेतु एक अमूल्य उपकरण है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट की उपलब्धता ने वर्तमान युग में संचार को काफी आसान और सुविधाजनक बना दिया है।
इंटरनेट ने दूर-दराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले उन विद्यार्थियों के लिये भी बेहतर शिक्षा का विकल्प खोल दिया है, जिनके पास अब तक इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
इंटरनेट के माध्यम से सूचना के क्षेत्र में भी एक मज़बूत क्रांति देखी गई है। अब हम इंटरनेट के माध्यम से किसी भी प्रकार की सूचना को कुछ ही मिनटों में प्राप्त कर सकते हैं।
सूचना तक आसान पहुँच के कारण आम लोग अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक हुए हैं।
सभी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने से सरकार की लागत में कमी को भी सुनिश्चित किया जा सकता है:यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाता है।
यह सरकारी योजनाओं के सफल कार्यान्वयन में सहायक है।
यह राजनीति एवं लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी को बढ़ाने में भी मदद करता है।
यह बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के अवसर प्रदान करने के सरकार के प्रयासों को भी बढ़ावा देता है।
यह भारतीय समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक लामबंदी में सहायक है।
शिक्षा में इंटरनेट की भूमिका
इंटरनेट शिक्षा क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान में लगभग सभी अपनी समस्याओं और प्रश्नों के लिये सर्वप्रथम गूगल पर ही सर्च करते हैं।
इंटरनेट पर लगभग सभी विषयों पर बहुत सारा ज्ञान उपलब्ध है, जिसे अपनी आवश्यकतानुसार कभी भी खोजा जा सकता है।
शिक्षा में इंटरनेट के लाभ:देश में शिक्षा के समक्ष जो सबसे बड़ी बाधा है वह है शिक्षा की लागत, परंतु इंटरनेट ने इस बाधा को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। साथ ही इंटरनेट के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार भी संभव हो पाया है।
इंटरनेट ने शिक्षक और विद्यार्थियों के मध्य संचार को सुगम बनाने का कार्य भी किया है।
भारत में इंटरनेट की उपलब्धता के समक्ष चुनौतियाँ
विगत कुछ वर्षों में कई निजी और सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप प्रदान किया गया है और जिनमें से कुछ तो सिर्फ ऑनलाइन ही उपलब्ध हैं जिसके कारण उन लोगों को असमानता का सामना करना पड़ता है जो डिजिटली निरक्षर हैं।
विश्वसनीय सूचना, बुनियादी ढाँचे और डिजिटल साक्षरता की कमी से उत्पन्न होने वाला डिजिटल विभाजन (Digital Divide) सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का कारण बन सकता है।डिजिटल विभाजन को पूरे भारत के सामाजिक-आर्थिक स्पेक्ट्रम अर्थात् ग्रामीण और शहरी भारत, अमीर और गरीब, भारत की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल (बूढ़े और जवान, पुरुष और महिला) के बीच देखा जा सकता है।
वर्ष 2016 के मध्य में जारी एक रिपोर्ट में सामने आया था कि भारत में डिजिटल साक्षरता की दर 10 प्रतिशत से भी कम है।
डिजिटल साक्षरता का अर्थ
डिजिटल साक्षरता का आशय उन तमाम तरह के कौशलों के एक समूह से है, जो इंटरनेट का प्रयोग करने और डिजिटल दुनिया के अनुकूल बनने के लिये आवश्यक हैं। चूँकि प्रिंट माध्यम का दायरा धीरे-धीरे सिकुड़ता जा रहा है और ऑनलाइन उपलब्ध जानकारियों का दायरा व्यापक होता जा रहा है, इसलिये ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी को समझने के लिये डिजिटल साक्षरता आवश्यक है।

डिजिटल साक्षरता और भारत
उल्लेखनीय है कि भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ऑनलाइन बाज़ार है, जहाँ लगभग 460 मिलियन इंटरनेट प्रयोगकर्त्ता मौजूद हैं।
आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 तक भारत में अनुमानतः 700 मिलियन इंटरनेट प्रयोगकर्त्ता मौजूद होंगे, जो कि काफी बड़ी संख्या है।
उपरोक्त आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत का इंटरनेट आधार (Internet Base) काफी व्यापक है, जिसके कारण यहाँ डिजिटल साक्षरता का विषय काफी महत्त्वपूर्ण हो गया है।
डिजिटल साक्षरता हेतु भारत के प्रयास
भारतनेट कार्यक्रम
भारतनेट परियोजना का नाम पहले ओएफसी नेटवर्क (Optical Fiber Communication Network) था।
इस परियोजना का उद्देश्य राज्यों तथा निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी से ग्रामीण तथा दूर-दराज़ के क्षेत्रों में नागरिकों एवं संस्थानों को सुलभ ब्रॉड बैंड सेवाएँ उपलब्ध कराना है।
भारतनेट परियोजना के तहत 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर के ज़रिये हाईस्पीड ब्रॉडबैंड, किफायती दरों पर उपलब्ध कराया जाना था। इसके तहत ब्रॉडबैंड की गति 2 से 20 mbps तक निर्धारित की गई थी।
इस परियोजना का वित्तपोषण यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (Universal Service Obligation Fund-USOF) द्वारा किया गया था।
इसके तहत स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों एवं कौशल विकास केंद्रों में इंटरनेट कनेक्शन नि:शुल्क प्रदान किया गया।
राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन
राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन (NDLM) की शुरुआत वर्ष 2020 तक भारत के प्रत्येक घर में कम-से-कम एक व्यक्ति को डिजिटल साक्षर बनाने के उद्देश्य से की गई है।
इस परियोजना का उद्देश्य तकनीकी दृष्टि से निरक्षर वयस्कों की मदद करना है ताकि वे तेज़ी से डिजिटल होती दुनिया में अपना स्थान खोज सकें।
कितना प्रासंगिक है इंटरनेट तक पहुँच का मौलिक अधिकार?
इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार का रूप देना, डिजिटल असमानता को कम करने हेतु उठाए गए कदम के रूप में देखा जा सकता है।
साथ ही इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने से अन्य अधिकारों जैसे- शिक्षा का अधिकार, निजता का अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आदि को सहारा मिलता है।
इस कदम से डिजिटल विभाजन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
इंटरनेट तक पहुँच का मौलिक अधिकार और संयुक्त राष्ट्र
उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2016 में इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की घोषणा की थी और साथ ही कहा था कि इंटरनेट से लोगों को पृथक करना मानवाधिकारों का उल्लंघन और अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है।

आगे की राह
इंटरनेट के प्रसार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है और इसलिये यह आवश्यक है कि केंद्र व राज्य सरकारें इस क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता दें ताकि इंटरनेट को सभी तक पहुँचाया जा सके।
डिजिटल साक्षरता की परिभाषा में आज संसाधनों और सूचनाओं को ऑनलाइन देखने और उन तक पहुँचने की क्षमता को भी शामिल किया जाना चाहिये।
इंटरनेट का उपयोग और डिजिटल साक्षरता एक-दूसरे पर निर्भर हैं, अतः डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के साथ-साथ डिजिटल कौशल प्रदान करना भी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त देश में दूरसंचार नियमों को और अधिक मज़बूती प्रदान करने की आवश्यकता है ताकि बाजार में प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देना केरल उच्च न्यायालय द्वारा उठाया गया एक सराहनीय कदम है। ज़ाहिर है कि यह कदम न केवल अन्य मौलिक अधिकारों को सहारा देगा बल्कि यह देश में डिजिटल असमानता को कम करने में भी मदद करेगा। परंतु इसका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि इसके समक्ष खड़ी बाधाओं जैसे- डिजिटल साक्षरता और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी आदि को समय रहते दूर किया जाए।

प्रश्न: इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिये जाने की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए इसके प्रभावों को बताएँ

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