प्रारंभिक परीक्षा पाठ्यक्रम

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का पाठ्यक्रम 

  • नई परीक्षा प्रणाली के अनुसार, वर्तमान में प्रारंभिक परीक्षा में दो प्रश्नपत्र शामिल हैं। पहला प्रश्नपत्र ‘सामान्य अध्ययन’ का है जबकि दूसरे को ‘सिविल सेवा अभिवृत्ति परीक्षा’ (Civil Services Aptitude Test) या ‘सीसैट’ कहा जाता है और यह क्वालीफाइंग पेपर के रूप में है।
  • दोनों प्रश्नपत्र 200-200 अंकों के होते हैं। पहले प्रश्नपत्र (सामान्य अध्ययन) में 2-2 अंकों के 100 प्रश्न होते हैं जबकि दूसरे प्रश्नपत्र (सीसैट) में 2.5-2.5 अंकों के 80 प्रश्न।
  • दोनों प्रश्नपत्रों में ‘निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू है जिसके तहत 3 उत्तर गलत होने पर 1 सही उत्तर के बराबर अंक काट लिये जाते हैं। सीसैट में निर्णयन क्षमता से संबद्ध प्रश्नों में गलत उत्तर के लिये अंक नहीं काटे जाते।
  • चूँकि अब सीसैट पेपर को सिर्फ क्वालीफाइंग कर दिया गया है इसलिये प्रारंभिक परीक्षा पास करने के लिये किसी भी उम्मीदवार को सीसैट पेपर में सिर्फ 33 प्रतिशत अंक (लगभग 27 प्रश्न या 66 अंक) प्राप्त करने आवश्यक हैं। अगर वह इससे कम अंक प्राप्त करता है तो उसे फेल माना जाता है। अब कट-ऑफ का निर्धारण सिर्फ प्रथम प्रश्नपत्र यानी सामान्य अध्ययन के आधार पर किया जाता है।

 

प्रश्नपत्र -1

प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्र-1 का संबंध ‘सामान्य अध्ययन’ से है। इसका पाठ्यक्रम निम्नलिखित है-

  1. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ (Current events of national and international importance)
  2. भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (History of India and Indian National Movement)।
  3. भारत एवं विश्व का भूगोल : भारत एवं विश्व का प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल (Indian and World Geography – Physical, Social, Economic Geography of India and the World)।
  4. भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान, राजनीतिक प्रणाली, पंचायती राज, लोकनीति, अधिकारों संबंधी मुद्दे इत्यादि (Indian Polity and Governance – Constitution, Political System, Panchayati Raj, Public Policy, Rights Issues etc)।
  5. आर्थिक और सामाजिक विकास- सतत् विकास, गरीबी, समावेशन, जनसांख्यिकी, सामाजिक क्षेत्र में की गई पहल आदि (Economic and Social Development, Sustainable Development-Poverty, Inclusion, Demographics, Social Sector initiatives etc)।
  6. पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे, जिनके लिये विषयगत विशेषज्ञता आवश्यक नहीं है (General issues on Environmental Ecologh2y, Bio-diversity and Climate Change – that do not require subject specialization)।
  7. सामान्य विज्ञान (General Science)।

प्रश्नपत्र -2

प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्र- 2  का संबंध ‘सीसैट’ से है। इसका पाठ्यक्रम निम्नलिखित है-

  • बोधगम्यता (Comprehension)।
  • संचार कौशल सहित अंतर-वैयक्तिक कौशल (Interpersonal skills including communication skills)।
  • तार्किक कौशल एवं विश्लेषणात्मक क्षमता (Logical reasoning and analytical ability)।
  • निर्णय लेना और समस्या समाधान(Decision-making and problem-solving)।
  • सामान्य मानसिक योग्यता (General mental ability)।
  • आधारभूत संख्ययन (संख्याएँ और उनके संबंध, विस्तार-क्रम आदि) (दसवीं कक्षा का स्तर); आँकड़ों का निर्वचन (चार्ट, ग्राफ, तालिका, आँकड़ों की पर्याप्तता आदि- दसवीं कक्षा का स्तर) [Basic numeracy (numbers and their relations, orders of magnitude, etc.) (Class X level), Data interpretation (charts, graphs, tables, data sufficiency etc. (Class X level)]

नोट – प्रारंभिक परीक्षा में वस्तुनिष्ठ प्रकृति (Objective type) के प्रश्न पूछे जाते हैं, जिसके अंतर्गत प्रत्येक प्रश्न के लिये दिये गए चार संभावित विकल्पों (a, b, c और d) में से एक सही विकल्प का चयन करना होता है।

 

 

प्रारंभिक परीक्षा रणनीति

 

सामान्य अध्ययन रणनीति

 

  • प्रारंभिक परीक्षा के प्रथम प्रश्नपत्र में दो तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं, एक तो सामान्य अध्ययन के परंपरागत खंडों से और दूसरे, समसामयिक घटनाक्रमों से| परंपरागत खंडों से पूछे जाने वाले प्रश्न मुख्यतः भारत के इतिहास और स्वाधीनता आंदोलन; भारतीय संविधान व राजव्यवस्था; भारत और विश्व का भूगोल; पारिस्थितिकी, पर्यावरण और जैव विविधता; भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक और सामाजिक विकास; सामान्य विज्ञान से संबंधित होते हैं। साथ ही, इस प्रश्नपत्र में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के समसामयिक घटनाक्रमों से संबंधित प्रश्न भी पूछे जाते हैं।
  • इस प्रश्नपत्र की सटीक रणनीति बनाने के लिये विगत 6 वर्षों में प्रारंभिक परीक्षा में इसके विभिन्न खंडों से पूछे गए प्रश्नों का सूक्ष्म अवलोकन आवश्यक है, जिनका विस्तृत विवरण इस तालिका के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
 विषय  2011  2012  2013  2014  2015 2016  प्रतिवर्ष औसतन पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या
 भारत का इतिहास और स्वाधीनता आंदोलन 13 20 16 19  16  16  17
 भारतीय संविधान व राजव्यवस्था 10  21 17 10  13  6  13
 भारत और विश्व का भूगोल  16  17  18  20  18  3  15
 पारिस्थितिकी, पर्यावरण और जैव विविधता  17  14  14  20  12  16  15
 भारत की अर्थव्यवस्था, आर्थिक और सामाजिक विकास  22  14  18  11  16  15  16
 सामान्य विज्ञान  16  10  16  12  9  7  12
 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की समसामयिक  घटनाएँ/विविध  06  04  01  08  16  37  12
 कुल  100  100  100  100  100  100  100
  • यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए विगत वर्षों के प्रश्नों का अवलोकन किया जाए तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है किन उपखंडों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है और किन पर कम।

भारत का इतिहास और स्वाधीनता आंदोलन

  • भारतीय इतिहास खंड का न सिर्फ प्रारंभिक परीक्षा में बल्कि मुख्य परीक्षा में भी खासा महत्त्व होता है। चूँकि इतिहास का पाठ्यक्रम अत्यंत विस्तृत है, इसलिये इसे पूरी तरह से पढ़ पाना और तथ्यों एवं अवधारणाओं को याद रख पाना आसान कार्य नहीं है। परंतु, विगत वर्षों में इस खंड से पूछे गए प्रश्नों का अवलोकन किया जाए, तो स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है किन उपखंडों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है और किन पर कम।
  • ध्यातव्य है कि प्रारंभिक परीक्षा में पिछले छह वर्षों में इस खंड से औसतन 17 प्रश्न पूछे गए हैं और आगे भी कम-से-कम इतने ही प्रश्न पूछे जाने की संभावना है।
  • आधुनिक भारतीय इतिहास विशेषकर स्वतंत्रता आंदोलन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि आज भी सर्वाधिक प्रश्न इसी खंड से पूछे जाते हैं।
  • कला एवं संस्कृति का क्षेत्र भी प्रारंभिक परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस खंड से न केवल प्रारंभिक परीक्षा बल्कि मुख्य परीक्षा में भी ठीक-ठाक संख्या में प्रश्न पूछे जाते हैं। खासतौर पर स्थापत्य कला, मूर्तिकला, नृत्य-नाटक, संगीत कला, भक्ति दर्शन, भाषा और लिपि इत्यादि।
  • मध्यकालीन भारतीय इतिहास को समय रहते पढ़ लेना चाहिये क्योंकि इससे संबंधित प्रश्नों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
  • समय रहने पर अगर प्राचीन भारत के कुछ महत्त्वपूर्ण खंडों, यथा- बुद्ध, महावीर, हड़प्पा सभ्यता, वैदिक संस्कृति, मौर्य काल तथा गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था आदि का अध्ययन कर लिया जाए तो आसानी से दो-तीन प्रश्नों की बढ़त ली जा सकती है।

भारतीय संविधान राजव्यवस्था 

  • अगर विगत 6 वर्षों में इस खंड से पूछे गए प्रश्नों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि इस खंड से औसतन 11-12 प्रश्न पूछे गए हैं। गौरतलब है कि यह खंड कम समय में अधिक अंक दिलाने वाला है, इसलिये इस पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • हालाँकि, 2016 में इस खंड से पूछे गए प्रश्नों की संख्या विगत वर्षों की तुलना में लगभग आधी थी,  फिर भी किसी एक वर्ष के आधार पर इसकी तैयारी में कोताही करना गलत होगा।
  • ध्यातव्य है कि यूपीएससी परीक्षा को इसके अनिश्चित स्वरूप के लिये जाना जाता है| अतः इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगले वर्ष इस खंड से संबंधित प्रश्नों की संख्या में बढ़ोतरी हो जाए, इसलिये इस खंड की पूरी तरह से तैयारी करनी चाहिये।
  • संघीय कार्यपालिका एवं संसद वाले उपखंडों पर अधिकाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। विगत वर्षों में केवल इस खंड से प्रतिवर्ष औसतन 5 प्रश्न पूछे गए हैं। इस खंड को गहराई से पढ़ लेने पर 3-4 प्रश्न तो आसानी से हल किये ही जा सकते हैं।
  • न्यायपालिका, मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्त्व वाले खंड से हर साल प्रायः 1-2 प्रश्न पूछ लिये जाते हैं। यह एक छोटा खंड है, इसलिये अगर इसे पढ़कर 1-2 प्रश्न सही किये जा सकते हैं तो इसे अच्छी तरह से पढ़ ही लेना चाहिये।
  • राज्य सरकार एवं स्थानीय शासन से संबंधित भी प्रायः 1-2 प्रश्न पूछ लिये जाते हैं, अतः इन्हें भी एक-दो बार ठीक से पढ़ लेना सही होगा।
  • संविधान एवं राजव्यवस्था के अन्य उपखंडों को समय रहने पर पढ़ा जा सकता है, अन्यथा छोड़ा भी जा सकता है।
  • वर्तमान में प्रचलित राजनीतिक मुद्दों से संबंधित अवधारणात्मक बिंदुओं, जैसे- संविधान संशोधन तथा विभिन्न आयोगों आदि के बारे में जानकारी रखना आवश्यक है।

भारत और विश्व का भूगोल 

  • भूगोल खंड न केवल प्रारंभिक परीक्षा बल्कि मुख्य परीक्षा के लिये भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। साथ ही, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध आदि खंडों की अवधारणाओं को समझने के लिये भी भूगोल की समझ होनी ज़रूरी है।
  • अगर भूगोल खंड से पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रवृत्ति को देखा जाए तो इस खंड से हर साल औसतन 15 प्रश्न पूछे जाते रहे हैं। हालाँकि, 2016 की प्रारंभिक परीक्षा में भूगोल खंड से सिर्फ 3 प्रश्न पूछे गए।
  • सामान्यतः विश्व एवं भारत का भूगोल दोनों उपखंडों से पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या बराबर ही रहती है| (वर्ष 2016 को छोड़कर) अतः दोनों उपखंडों पर समान रूप से ध्यान देने की ज़रूरत है।
  • सामान्यतः विश्व के भूगोल से जटिल प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं। अगर मानचित्र और भूगोल की बुनियादी अवधारणाओं पर आपकी मज़बूत पकड़ है, तो आप आसानी से अधिकांश प्रश्नों को सही कर सकते हैं। इसके लिये, चर्चा में रहे विभिन्न स्थानों की अवस्थिति एवं उनके बारे में बुनियादी भौगोलिक जानकारियों की भी एक सूची बना लेनी चाहिये।
  • भारत के भूगोल के बारे में आपसे थोड़ी गहरी समझ की अपेक्षा होती है। इसलिये भारत के भूगोल से संबंधित महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं के साथ-साथ कुछ तथ्यों को भी याद रखना ज़रूरी होता है।
  • विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्नों की प्रवृत्ति को देखने पर यह समझ आता है कि भूगोल खंड में एनसीईआरटी की पुस्तकों एवं मानचित्र का अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है। कई प्रश्न सीधे तौर पर इन्हीं स्रोतों से पूछ लिये जाते हैं।

पारिस्थितिकी, पर्यावरण और जैव विविधता 

  • यूँ तो पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के इस खंड को अन्य खंडों से बिल्कुल अलग करके देखना कठिन है। दरअसल, यह खंड भूगोल, जीव विज्ञान एवं समसामयिकी का मिला-जुला रूप है, इसलिये इसकी तैयारी के लिये अवधारणाओं (concepts) के साथ-साथ इससे संबंधित समसामयिक घटनाओं पर अधिकाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • विगत 6 वर्षों में इस खंड से प्रतिवर्ष औसतन 15 प्रश्न पूछे जाते रहे हैं। अगर इन प्रश्नों की प्रवृत्ति को देखें तो इनमें से अधिकांश प्रश्न हाल-फिलहाल की घटनाओं से जोड़कर पूछे गए हैं।
  • पर्यावरण से संबंधित विभिन्न वैश्विक संगठनों, राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर के सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों, संस्थानों और समूहों की कार्यप्रणाली, उद्देश्य व अधिकार क्षेत्र आदि से भी प्रश्न पूछे जाते हैं।
  • अगर हाल-फिलहाल में पर्यावरण को लेकर कोई सम्मेलन या संधि हुई हो तो उसके उद्देश्यों, कार्य-क्षेत्र एवं प्रमुख निर्णयों पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • चूँकि वर्तमान में प्रदूषण संपूर्ण विश्व के लिये एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है, इसलिये प्रदूषण से संबंधित प्रश्न पूछे जाने की भरपूर संभावना रहती है।
  • राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण दूर करने के लिये उठाए जा रहे कदम, प्रदूषण नियंत्रण के महत्त्वपूर्ण मानक, नियम और कानूनी प्रावधान इत्यादि पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • जैव-विविधता एवं मौसम परिवर्तन से संबंधित मुद्दों पर भी पैनी निगाह रखनी चाहिये। जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण व विनियमन हेतु पारित महत्त्वपूर्ण अधिनियम, विभिन्न जीव-जंतुओं व वनस्पतियों की विलुप्ति एवं संकटग्रस्तता, महत्त्वपूर्ण प्रजातियों के वन्य जीवों की विशेषताएँ, आवास एवं उनके समक्ष उपस्थित खतरों आदि की सूची बना लेनी चाहिये और उनमें आवश्यकतानुसार अद्यतन सूचनाओं ( updated news ) को जोड़ते रहना चाहिये।
  • पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की तैयारी के लिये मूल रूप से समसामयिक घटनाक्रमों पर अधिकाधिक ध्यान देना चाहिये। साथ ही, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी से संबंधित सरकारी मंत्रालयों एवं विभिन्न संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण रिपोर्टों को भी अध्ययन में शामिल करना चाहिये।

भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक और सामाजिक विकास 

  • अर्थव्यवस्था वाले खंड से पूछे गए प्रश्नों की संख्या पिछले पाँच सालों में लगभग एकसमान ही रही हैं। इसका अध्यायवार विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि इस खंड से प्रतिवर्ष औसतन 16 प्रश्न पूछे जाते हैं। इसलिये यह खंड प्रारंभिक परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • वैसे, इस खंड में अधिकांश प्रश्न भारतीय अर्थव्यवस्था से ही पूछे जाते हैं, लेकिन कभी-कभार 1-2 प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से भी पूछ लिये जाते हैं।
  • समसामयिक मुद्दों से संबंधित अवधारणाओं से ठीक-ठाक संख्या में प्रश्न पूछे जाते हैं। उदाहरण के लिये, हाल ही में लिये गए नोटबंदी के फैसले के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था काफी चर्चा में रही है। अतः वर्तमान आर्थिक गतिविधियों पर भी पैनी नज़र रखने की आवश्यकता है।
  • बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थान, राष्ट्रीय आय और पंचवर्षीय योजना, राजकोषीय नीति और मुद्रास्फीति आदि क्षेत्रों में विशेष रूप से पकड़ बनाने की आवश्यकता है।
  • बैंकिंग एवं संबद्ध वित्तीय संस्थानों से प्रतिवर्ष औसतन चार प्रश्न पूछे जाते रहे हैं, इसलिये इन पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही, बैंकिंग क्षेत्र एवं लोकवित्त के क्षेत्र में होने वाले विभिन्न सुधारों पर भी गौर किये जाने की आवश्यकता है।

सामान्य विज्ञान 

  • सामान्य विज्ञान, सामान्य अध्ययन के उन खंडों में शामिल है जिन पर मज़बूत पकड़ बनाकर आप सामान्य प्रतियोगियों से बढ़त ले सकते हैं। दरअसल, इतिहास और राजव्यवस्था तथा अन्य परंपरागत खंड ऐसे विषयों से संबंधित हैं, जिन पर सामान्य विद्यार्थियों की ठीक-ठाक पकड़ होती है; परंतु विज्ञान एवं अर्थव्यवस्था जैसे खंडों के विषय में आम विद्यार्थियों की धारणा एक बोझिल विषय के रूप में होती है। इसलिये कई विद्यार्थी इस खंड को लगभग छोड़कर चलते हैं।
  • ऐसे में, अगर आप इस खंड का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करते हैं तो आप कम मेहनत में अच्छी बढ़त हासिल कर सकते हैं।
  • पिछले छह वर्षों में इस खंड से प्रतिवर्ष औसतन 12 प्रश्न पूछे गए हैं।
  • प्रश्नों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक वर्ष सर्वाधिक प्रश्न जीव विज्ञान खंड से पूछे जाते रहे हैं, जबकि रसायन विज्ञान की महत्ता लगभग नगण्य है। हाँ, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रौद्योगिकी से संबंधित प्रश्नों की संख्या में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है। उदाहरण के लिये वर्ष 2015 में 7 सवाल सीधे प्रौद्योगिकी खंड से पूछे गए, इसी तरह  2016 में भी 3 प्रश्न प्रौद्योगिकी खंड से पूछे गए हैं।
  • यद्यपि प्रौद्योगिकी मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल है और प्रारंभिक परीक्षा के पाठ्यक्रम में सीधे तौर पर इसका उल्लेख नहीं है, परंतु पूछे जा रहे प्रश्नों की प्रवृत्ति को देखते हुए प्रौद्योगिकी के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। इस पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है, खासतौर पर हाल-फिलहाल में हुए प्रौद्योगिकीय विकास पर ध्यान देना अति आवश्यक है।
  • वैसे, देखा जाए तो सामान्य विज्ञान (भौतिक, रसायन एवं जीव विज्ञान) से प्रायः व्यावहारिक अनुप्रयोगों से संबंधित प्रश्न ही पूछे जाते हैं, जिनमें किसी विशेष प्रकार के सिद्धांत एवं जटिल अवधारणाओं की समझ की अपेक्षा नहीं होती। इसलिये सामान्य विज्ञान में भी व्यावहारिक अनुप्रयोगों से संबंधित संकल्पनाओं को अध्ययन में प्रमुखता देनी चाहिये।
  • चूँकि विगत वर्षों में सर्वाधिक प्रश्न जीव विज्ञान से पूछे गए हैं, इसलिये जीव विज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिये। जीव विज्ञान में भी अगर देखा जाए तो वनस्पति विज्ञान, विभिन्न रोगों, आनुवंशिकी, जैव विकास व जैव-विविधता तथा जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित प्रश्न अधिक पूछे गए हैं। इसलिये जीव विज्ञान के अध्ययन में भी इन उपखंडों को प्रमुखता दी जानी चाहिये।
  • देखा जाए तो भौतिक विज्ञान से प्रतिवर्ष औसतन 2 प्रश्न पूछे गए हैं। अगर पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को देखा जाए तो अधिकांश प्रश्न प्रकाश, ऊष्मा, ध्वनि, विद्युत धारा एवं गति जैसे अध्यायों से ही पूछे गए हैं।
  • इस तरह, अगर इन अध्यायों से संबंधित साधारण संकल्पनाओं (concepts) को समझ लिया जाए तो भौतिक विज्ञान के प्रश्न भी आपकी पहुँच से बाहर नहीं जाएंगे। वहीं, रसायन विज्ञान से पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या नगण्य है, इसलिये अगर इसे छोड़ भी दिया जाए तो कोई विशेष नुकसान नहीं है।

वस्तुतः सामान्य अध्ययन के इन परंपरागत प्रश्नों को हल करने के लिये संबंधित शीर्षक की कक्षा- 6 से कक्षा-12 तक की एनसीईआरटी की पुस्तकों का अध्ययन करने के साथ-साथ ‘दृष्टि पब्लिकेशन्स’ द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे’ के सामान्य अध्ययन के विशेषांक खंडों का अध्ययन करना लाभदायक रहेगा। कुछ विशेष खंडों के लिये बाज़ार में उपलब्ध मानक पुस्तकों का भी अध्ययन किया जा सकता है, जिनकी सूची अंत में संलग्न की गई है।

 

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की समकालीन घटनाएँ/विविध 

  • केवल समसामयिकी ही नहीं, बल्कि अन्य खंडों से पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति को देखने पर स्पष्ट होता है कि इस परीक्षा में समसामयिकी खंड की अहम भूमिका है। सामान्य अध्ययन के परंपरागत खंडों से भी कई प्रश्न सीधे तौर पर इस तरह के पूछे जाते हैं जो वर्तमान में कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में चर्चा में रहे हों। इसलिये समसामयिकी घटनाओं पर पैनी नज़र रखनी चाहिये।
  • गौरतलब है कि 2016 में 37 प्रश्न सीधे तौर पर समसामयिकी खंड से पूछे गए हैं। अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सारे प्रश्नों का आधार करेंट अफेयर्स ही था। साथ ही, यह खंड मुख्य परीक्षा में भी बराबर का महत्त्व रखता है। इसलिये सामान्य अध्ययन के इस खंड पर सर्वाधिक गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है।
  • चूँकि समसामयिकी का विस्तार अपने आप में व्यापक है, इसलिये इस पर महारत हासिल करने की बात सोचना ही बेमानी है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर असंख्य घटनाएँ होती रहती हैं, ऐसे में सारे घटनाक्रमों को याद रख पाना अत्यंत कठिन कार्य है। इसलिये समसामयिकी में भी चयनित अध्ययन की ज़रूरत होती है।
  • इसके लिये आवश्यक है कि सबसे पहले तो अनावश्यक तिथियों, पुरस्कारों, घटनाओं और आँकड़ों आदि को रटने से बचें। सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा के वर्तमान प्रारूप में ऐसे तथ्यात्मक प्रश्न नहीं के बराबर पूछे जाते हैं।
  • समसामयिकी में भी विभिन्न विषयों के अलग-अलग खंड बनाकर संक्षिप्त नोट्स बना लेने चाहियें। जैसे कि किसी खंड विशेष से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण घटना राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में घटती है तो उसे अपने नोट्स के उस खंड में जोड़ लें। इससे फायदा यह होगा कि आपको समसामयिकी से संबंधित तथ्यों को याद रखने एवं रिवीज़न करने में आसानी होगी तथा ये नोट्स आपको न केवल प्रारंभिक परीक्षा में बल्कि मुख्य परीक्षा में भी लाभ पहुँचाएंगे।
  • समसामयिकी खंड की तैयारी के लिहाज़ से देश-दुनिया में घट रही आर्थिक, राजनीतिक, पारिस्थितिक, सांस्कृतिक आदि घटनाओं की सूक्ष्म जानकारी पर विद्यार्थियों की विशेष नज़र रहनी चाहिये।
  • यूपीएससी में सामान्यतः नवीनतम घटनाओं की जगह विशेषीकृत घटनाओं से जुड़े सवाल थोड़े गहराई से पूछे जाते हैं। इसमें विद्यार्थियों से सरकार की नीतियों और नए अधिनियमों के संबंध में गहरी समझ की अपेक्षा की जाती है। अतः विद्यार्थियों को सालभर की घटनाओं पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।
  • संवैधानिक विकास, विभिन्न योजनाओं, लोक नीति, आर्थिक सुधारों, प्रौद्योगिकीय और पर्यावरणीय विकास तथा इनसे संबद्ध प्रमुख अवधारणाओं पर विशेष रूप से ध्यान दें।

 

 

 

सिविल सेवा परीक्षा : एक परिचय

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), जो भारत का एक संवैधानिक निकाय है, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसी अखिल भारतीय सेवाओं तथा भारतीय विदेश सेवा (IFS), भारतीय राजस्व सेवा (IRS), भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) एवं भारतीय कंपनी कानून सेवा (ICLS) आदि जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं हेतु अभ्यर्थियों का चयन करने के लिये प्रत्येक वर्ष सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करता है। प्रत्येक वर्ष लाखों अभ्यर्थी अपना भाग्य आज़माने के लिये इस परीक्षा में बैठते हैं। तथापि, उनमें से चंद अभ्यर्थियों को ही “राष्ट्र के वास्तुकार (Architect of Nation) की संज्ञा से विभूषित इन प्रतिष्ठित पदों तक पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त होता है। ‘सिविल सेवा परीक्षा’ मुख्यत: तीन चरणों (प्रारंभिक, मुख्य एवं साक्षात्कार) में सम्पन्न की जाती है जिनका सामान्य परिचय इस प्रकार है-

प्रारंभिक परीक्षा:

  • सिविल सेवा परीक्षा का प्रथम चरण प्रारंभिक परीक्षा कहलाता है। इसकी प्रकृति पूरी तरह वस्तुनिष्ठ (बहुविकल्पीय) होती है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक प्रश्न के लिये दिये गए चार संभावित विकल्पों (a, b, c और d) में से एक सही विकल्प का चयन करना होता है।
  • प्रश्न से सम्बंधित आपके चयनित विकल्प को आयोग द्वारा दी गई ओएमआर सीट में प्रश्न के सम्मुख दिये गए संबंधित गोले (सर्किल) में उचित स्थान पर काले बॉल पॉइंट पेन से भरना होता है।
  • सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 200 अंकों की होती है।
  • वर्तमान में प्रारंभिक परीक्षा में दो प्रश्नपत्र शामिल हैं। पहला प्रश्नपत्र सामान्य अध्ययन’ (100 प्रश्न, 200 अंक) का है, जबकि दूसरे को ‘सिविल सेवा अभिवृत्ति परीक्षा’ (Civil Services Aptitude Test) या सीसैट’ (80 प्रश्न, 200 अंक) का होता है और यह क्वालीफाइंग पेपर के रूप में है। सीसैट प्रश्नपत्र में 33% अंक प्राप्त करने आवश्यक हैं।
  • दोनों प्रश्नपत्रों में ‘निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू है जिसके तहत 3 उत्तर गलत होने पर 1 सही उत्तर के बराबर अंक काट लिये जाते हैं।
  • प्रारंभिक परीक्षा में कट-ऑफ का निर्धारण सिर्फ प्रथम प्रश्नपत्र यानी सामान्य अध्ययन के आधार पर किया जाता है।

मुख्य परीक्षा

  • सिविल सेवा परीक्षा का दूसरा चरण ‘मुख्य परीक्षा’ कहलाता है।
  • प्रारंभिक परीक्षा का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि सभी उम्मीदवारों में से कुछ गंभीर व योग्य उम्मीदवारों को चुन लिया जाए तथा वास्तविक परीक्षा उन चुने हुए उम्मीदवारों के बीच आयोजित कराई जाए।
  • मुख्य परीक्षा कुल 1750 अंकों की है जिसमें 1000 अंक सामान्य अध्ययन के लिये (250-250 अंकों के 4 प्रश्नपत्र), 500 अंक एक वैकल्पिक विषय के लिये (250-250 अंकों के 2 प्रश्नपत्र) तथा 250 अंक निबंध के लिये निर्धारित हैं।
  • मुख्य परीक्षा में ‘क्वालिफाइंग’ प्रकृति के दोनों प्रश्नपत्रों (अंग्रेज़ी एवं हिंदी या संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कोई भाषा) के लिये 300-300 अंक निर्धारित हैं, जिनमें न्यूनतम अर्हता अंक 25% (75 अंक) निर्धारित किये गए हैं। इन प्रश्नपत्रों के अंक योग्यता निर्धारण में नहीं जोड़े जाते हैं।
  • मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में साथ-साथ प्रकाशित किये जाते हैं, हालाँकि उम्मीदवारों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से किसी में भी उत्तर देने की छूट होती है (केवल साहित्य के विषयों में यह छूट है कि उम्मीदवार उसी भाषा की लिपि में उत्तर लिखे है, चाहे उसका माध्यम वह भाषा न हो)।
  • गौरतलब है कि जहाँ प्रारंभिक परीक्षा पूरी तरह वस्तुनिष्ठ (Objective) होती है, वहीं मुख्य परीक्षा में अलग-अलग शब्द सीमा वाले वर्णनात्मक (Descriptive) या व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) प्रश्न पूछे जाते हैं। इन प्रश्नों में विभिन्न विकल्पों में से उत्तर चुनना नहीं होता बल्कि अपने शब्दों में लिखना होता है। यही कारण है कि मुख्य परीक्षा में सफल होने के लिये अच्छी लेखन शैली बहुत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

साक्षात्कार

  • सिविल सेवा परीक्षा का अंतिम एवं महत्त्वपूर्ण चरण साक्षात्कार (Interview) कहलाता है।
  • मुख्य परीक्षा मे चयनित अभ्यर्थियों को सामान्यत: फरवरी-मार्च-अप्रैल माह में आयोग के समक्ष साक्षात्कार के लिये उपस्थित होना होता है।
  • इसमें न तो प्रारंभिक परीक्षा की तरह सही उत्तर के लिये विकल्प दिये जाते हैं और न ही मुख्य परीक्षा के कुछ प्रश्नपत्रों की तरह अपनी सुविधा से प्रश्नों के चयन की सुविधा होती है। हर प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य होता है और हर उत्तर पर आपसे प्रतिप्रश्न भी पूछे जा सकते हैं। हर गलत या हल्का उत्तर ‘नैगेटिव मार्किंग’ जैसा नुकसान करता है और इससे भी मुश्किल बात यह कि परीक्षा के पहले दो चरणों के विपरीत इसके लिये कोई निश्चित पाठ्यक्रम भी नहीं है। दुनिया में जो भी प्रश्न सोचा जा सकता है, वह इसके पाठ्यक्रम का हिस्सा है। दरअसल, यह परीक्षा अपनी प्रकृति में ही ऐसी है कि उम्मीदवार का बेचैन होना स्वाभाविक है।
  • यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में इंटरव्यू के लिये कुल 275 अंक निर्धारित किये गए हैं। मुख्य परीक्षा के अंकों (1750 अंक) की तुलना में इस चरण के लिये निर्धारित अंक कम अवश्य हैं लेकिन अंतिम चयन एवं पद निर्धारण में इन अंकों का विशेष योगदान होता है।
  • इंटरव्यू के दौरान अभ्यर्थियों के व्यक्तित्व का परीक्षण किया जाता है, जिसमें आयोग में निर्धारित स्थान पर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों द्वारा मौखिक प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनका उत्तर अभ्यर्थी को मौखिक रूप से ही  देना होता है। यह प्रक्रिया अभ्यर्थियों की संख्या के अनुसार सामान्यत: 40-50 दिनों तक चलती है।
  • मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार में प्राप्त किये गए अंकों के योग के आधार पर अंतिम रूप से मेधा सूची (मेरिट लिस्ट) तैयार की जाती है।
  • इस चरण के लिये चयनित सभी अभ्यर्थियों का इंटरव्यू समाप्त होने के सामान्यत: एक सप्ताह पश्चात् अन्तिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी की जाती है।

सिविल सेवा परीक्षा का प्रारूप

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा का प्रारूप इस प्रकार है –

परीक्षा  परीक्षा आयोजन का माह  (सामान्यत:) विषय  कुल अंक 
*1  प्रारंभिक  मई सामान्य अध्ययन  प्रश्नपत्र  I & II प्रश्नपत्र  I – 200

प्रश्नपत्र  II – 200

मुख्य  सितंबर सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –I)

सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –II)

सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –III)

सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –IV)

वैकल्पिक विषय (प्रश्नपत्र –I)

वैकल्पिक विषय (प्रश्नपत्र –II)

निबंध लेखन

250

250

250

250

250

250

250

*2 अनिवार्य : अंग्रेज़ी

*3 अनिवार्य : भारतीय भाषा

300

300

साक्षात्कार  फरवरी-मार्च-अप्रैल व्यक्तित्व परीक्षण 275

 

नोट:

  • *1 प्रारंभिक परीक्षा में प्राप्त किये गये अंकों को मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार के अंकों के साथ नहीं जोड़ा जाता है।
  • *2,*3  अनिवार्य अंग्रेज़ी एवं भारतीय भाषा में प्राप्त किये गए अंकों को भी मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार के अंकों (1750+275=2025) के साथ नहीं जोड़ा जाता है। 
  • उम्मीदवार का अंतिम चयन मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार में प्राप्त किये गये अंकों के योग के आधार पर होता है।     

 

 

सिविल सेवा ही क्यों ?

आखिर हम सिविल सेवक के रूप में अपना कॅरियर क्यों चुनना चाहते हैं- क्या सिर्फ देश सेवा के लिये? वो तो अन्य रूपों में भी की जा सकती है। या फिर सिर्फ पैसों के लिये? लेकिन इससे अधिक वेतन तो अन्य नौकरियों एवं व्यवसायों में मिल सकता है। फिर ऐसी क्या वजह है कि सिविल सेवा हमें इतना आकर्षित करती है? आइये, अब हम आपको सिविल सेवा की कुछ खूबियों से अवगत कराते हैं जो इसे आकर्षण का केंद्र बनाती हैं।

  • यदि हम एक सिविल सेवक बनना चाहते हैं तो स्वाभाविक है कि हम ये भी जानें कि एक सिविल सेवक बनकर हम क्या-क्या कर सकते हैं? इस परीक्षा को पास करके हम किन-किन पदों पर नियुक्त होते हैं? हमारे पास क्या अधिकार होंगे? हमें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा? इसमें हमारी भूमिका क्या और कितनी परिवर्तनशील होगी इत्यादि।
  • अगर शासन व्यवस्था के स्तर पर देखें तो कार्यपालिका के महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन सिविल सेवकों के माध्यम से ही होता है। वस्तुतः औपनिवेशिक काल से ही सिविल सेवा को इस्पाती ढाँचे के रूप में देखा जाता रहा है। हालाँकि, स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 70 साल पूरे होने को हैं, तथापि इसकी महत्ता ज्यों की त्यों बनी हुई है, लेकिन इसमें कुछ संरचनात्मक बदलाव अवश्य आए हैं।
  • पहले, जहाँ यह नियंत्रक की भूमिका में थी, वहीं अब इसकी भूमिका कल्याणकारी राज्य के अभिकर्ता (Procurator) के रूप में तब्दील हो गई है, जिसके मूल में देश और व्यक्ति का विकास निहित है।
  • आज सिविल सेवकों के पास कार्य करने की व्यापक शक्तियाँ हैं, जिस कारण कई बार उनकी आलोचना भी की जाती है। लेकिन, यदि इस शक्ति का सही से इस्तेमाल किया जाए तो वह देश की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है। यही वजह है कि बड़े बदलाव या कुछ अच्छा कर गुज़रने की चाह रखने वाले युवा इस नौकरी की ओर आकर्षित होते हैं और इस बड़ी भूमिका में खुद को शामिल करने के लिये सिविल सेवा परीक्षा में सम्मिलित होते हैं।
  • यह एकमात्र ऐसी परीक्षा है जिसमें सफल होने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासन के उच्च पदों पर आसीन होने और नीति-निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने का मौका मिलता है।
  • इसमें  केवल आकर्षक वेतन, पद की सुरक्षा, कार्य क्षेत्र का वैविध्य और अन्य तमाम प्रकार की सुविधाएँ ही नहीं मिलती हैं बल्कि देश के प्रशासन में शीर्ष पर पहुँचने के अवसर के साथ-साथ उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा भी मिलती है।
  • हमें आए दिन ऐसे आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के बारे में पढ़ने-सुनने को मिलता है, जिन्होंने अपने ज़िले या किसी अन्य क्षेत्र में कमाल का काम किया हो। इस कमाल के पीछे उनकी व्यक्तिगत मेहनत तो होती ही है, साथ ही इसमें बड़ा योगदान इस सेवा की प्रकृति का भी है जो उन्हें ढेर सारे विकल्प और उन विकल्पों पर सफलतापूर्वक कार्य करने का अवसर प्रदान करती है।
  • नीति-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण ही सिविल सेवक नीतिगत सुधारों को मूर्त रूप प्रदान कर पाते हैं।
  • ऐसे अनेक सिविल सेवक हैं जिनके कार्य हमारे लिये प्रेरणास्रोत के समान हैं। जैसे- एक आईएएस अधिकारी  एस.आर. शंकरण जीवनभर बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ लड़ते रहे तथा उन्हीं के प्रयासों से “बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम,1976” जैसा कानून बना। इसी तरह बी.डी. शर्मा जैसे आईएएस अधिकारी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ नक्सलवाद की समस्या को सुलझाने का प्रयास किया तथा आदिवासी इलाकों में सफलतापूर्वक कई गतिशील योजनाओं को संचालित कर खासे लोकप्रिय हुए। इसी तरह, अनिल बोर्डिया जैसे आईएएस अधिकारी ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें इस सेवा के अंतर्गत ही अनेक महान कार्य करने के अवसर प्राप्त हुए, जिसके कारण यह सेवा अभ्यर्थियों को काफी आकर्षित करती है।
  • स्थायित्व, सम्मान एवं कार्य करने की व्यापक, अनुकूल एवं मनोचित दशाओं इत्यादि का बेहतर मंच उपलब्ध कराने के कारण ये सेवाएँ अभ्यर्थियों एवं समाज के बीच सदैव प्राथमिकता एवं प्रतिष्ठा की विषयवस्तु रही हैं।
  • कुल मिलाकर, सिविल सेवा में जाने के बाद हमारे पास आगे बढ़ने और देश को आगे बढ़ाने के अनेक अवसर होते हैं। सबसे बढ़कर हम एक साथ कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रबंधन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विकास में योगदान कर सकते हैं जो किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र में शायद ही सम्भव है।
  • सिविल सेवकों के पास ऐसी अनेक संस्थागत शक्तियाँ होती हैं जिनका उपयोग करके वे किसी भी क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं। यही वजह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में सफल लोग भी इस सेवा के प्रति आकर्षित होते हैं।
  • सिविल सेवा परीक्षा के अंतर्गत शामिल प्रत्येक सेवा की प्रकृति और चुनौतियाँ भिन्न-भिन्न हैं। इसलिये आगे हम प्रमुख सिविल सेवाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे, जैसे- उनमें कार्य करने का कितना स्कोप है, प्रोन्नति की क्या व्यवस्था है, हम किस पद तक पहुँच सकते हैं आदि, ताकि अपने ‘कॅरियर’ के प्रति हमारी दृष्टि और भी स्पष्ट हो सके।

 

 

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस)

ब्रिटिश काल में भारतीय प्रशासनिक सेवाओं को आई.सी.एस. (Indian Civil Service- ICS) के नाम से जाना जाता था। ध्यातव्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं में आईएएस सर्वाधिक लोकप्रिय सेवा है, यही वजह है कि सिविल सेवा परीक्षा में सफल होने वाले अधिकांश अभ्यर्थियों की पहली पसंद भारतीय प्रशासनिक सेवा ही होती है।

 

चयन प्रक्रिया :

  • हर साल संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली ‘सिविल सेवा परीक्षा’ के माध्यम से अखिल भारतीय सेवाओं और विभिन्न केंद्रीय सिविल सेवाओं के लिये योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाता है।
  • सिविल सेवा परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों को उनके प्राप्तांकों और मुख्य परीक्षा के फॉर्म में उनके द्वारा निर्धारित सेवाओं के वरीयता क्रम के आधार पर ही किसी सेवा के लिये चयनित किया जाता है।
  • आईएएस की सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए ही देश के लाखों युवाओं के बीच इसके प्रति ज़बरदस्त आकर्षण है। हर साल देश भर से लाखों युवा सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होते हैं लेकिन उनमें से कुछ-सौ या हज़ार युवा ही इसमें सफल होते हैं।
  • हर साल इस परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवारों में से लगभग 100 को ही ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ में जाने का अवसर मिलता है। ज़ाहिर है कि एक तरफ जहाँ इसके प्रति अत्यधिक क्रेज़ है, तो वहीं इसमें सफलता पाने के लिये कठिन मेहनत भी करनी पड़ती है।
  • आईएएस बनने के लिये सिर्फ सिविल सेवा परीक्षा पास करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके लिये ऊँची रैंक प्राप्त करना भी आवश्यक है। दरअसल, इस सेवा में कार्य करने और आगे बढ़ने के इतने अवसर होते हैं कि हर कोई इसके प्रति आकर्षित होता है। डॉक्टर, इंजीनियर तथा आई.आई.एम. से पढ़े हुए उम्मीदवार भी आईएएस बनने का सपना संजोए इस परीक्षा में अपनी किस्मत आज़माते हैं और सफल भी होते हैं|

शैक्षिक योग्यता:

  • सिविल सेवा परीक्षा में भाग लेने के लिये उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से स्नातक (Graduation) होना अनिवार्य है|

प्रशिक्षण :

  • भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों का प्रशिक्षण ब्रिटिशकाल से लेकर अब तक आवश्यकतानुसार परिवर्तित होता रहा है। वर्तमान में इस सेवा के अधिकारियों का प्रशिक्षण निम्नलिखित चरणों में पूरा होता है-
    1. आधारभूत प्रशिक्षण – 16 सप्ताह (मसूरी, उत्तराखंड )
    2. व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण-I) – 26 सप्ताह (मसूरी)
    3. राज्य स्तर पर प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) – 52 सप्ताह
    संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- I) – 3 सप्ताह
    विभिन्न कार्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) – 45 सप्ताह
    संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- II) – 4 सप्ताह
    4. व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण- II) – 9 सप्ताह

आधारभूत प्रशिक्षण :

  • सिविल सेवा परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय विदेश सेवा तथा केन्द्रीय सेवा वर्ग ‘अ’ के भावी अधिकारी सम्मिलित हैं, को एक-साथ ‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी (उत्तराखंड)’ में 16 सप्ताह का आधारभूत प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • यहाँ इन सेवाओं के प्रशिक्षु अधिकारी एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इससे इन प्रशिक्षु अधिकारियों में आपसी सामंजस्य तथा एकता का भाव पैदा होता है।
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम कई चरणों में संपादित होता है जो कठिन प्रकृति का होने के साथ-साथ रुचिकर भी होता है।
  • आधारभूत प्रशिक्षण (Foundational Course) में प्रशिक्षु अधिकारियों को भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, भारत का संविधान एवं प्रशासन, राजनीतिक सिद्धांत, लोक प्रशासन, विधि, आधारभूत अर्थशास्त्र एवं जनसंख्या अध्ययन और हिन्दी भाषा का अध्ययन करवाया जाता है। यह प्रशिक्षण मूलतः ज्ञान आधारित होता है।
  • इस प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य प्रशिक्षु अधिकारियों में अपेक्षित कौशल, ज्ञान तथा अभिवृत्ति का विकास करना तथा भारतीय परिवेश एवं मूल्यों को जानने के लिये अन्य सेवाओं के साथ समन्वय का भाव सिखाना होता है ताकि ये आने वाली बड़ी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिये प्रशिक्षित हो सकें।
  • आधारभूत प्रशिक्षण के पश्चात् आईएएस संवर्ग के प्रशिक्षु अधिकारी अकादमी में ही रहते हैं, जबकि अन्य सेवाओं के प्रशिक्षु अधिकारी अपने-अपने प्रशिक्षण संस्थानों में चले जाते हैं।

व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण -I) : 

  • आधारभूत प्रशिक्षण के बाद 26 सप्ताह का आईएएस व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण -I) शुरू होता है।
  • प्रशिक्षण का यह भाग कौशल उन्मुख होता है। इसमें इन्हें आवश्यक अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक व ज़मीनी सच्चाई से भी रूबरू कराया जाता है।
  • इस प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों को विभिन्न दलों में बाँटकर दो सप्ताह के लिये भारत भ्रमण कराया जाता है ताकि ये देश की सांस्कृतिक विविधता से परिचित हो सकें और देश के प्रति इनकी समझ अधिक परिपक्व हो सके।
  • इस दौरान इन्हें देश की संसदीय व्यवस्था का व्यावहारिक अनुभव भी कराया जाता है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री जैसे गणमान्य व्यक्तियों से मिलने का अवसर भी इसी चरण का हिस्सा है।

राज्य स्तर पर प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) :

  • मसूरी में आधारभूत तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण-I) पूरा करने के पश्चात् इन प्रशिक्षु अधिकारियों को इन्हें आवंटित राज्य में भेज दिया जाता है।
  • इसके पश्चात् 52 सप्ताह यानी एक वर्ष का ‘ज़िला स्तरीय प्रशिक्षण’ शुरू होता है, जिसमें प्रशिक्षुओं को आवंटित राज्य के किसी एक ज़िले में जाकर कार्य करना होता है।
  • इस प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षुओं को राज्य प्रशासनिक अकादमी में 3 सप्ताह का संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- I) दिया जाता है।
  • यहाँ प्रशिक्षुओं को राज्य के प्रशासनिक तंत्र की महत्त्वपूर्ण बातें समझाई जाती हैं। इस संस्थागत प्रशिक्षण के पश्चात् प्रशिक्षु अधिकारियों, जिन्हें ‘प्रोबेशनर’ (Probationer) कहा जाता है, को वास्तविक प्रशासनिक अनुभव हासिल कराने के लिये विभिन्न कार्यालयों में संलग्न किया जाता है। इसे ज़िला प्रशिक्षण कहते हैं।
  • इस दौरान इन्हें सामान्य कानून एवं नियम, कार्मिक प्रशासन, वित्तीय प्रशासन, राजस्व प्रशासन, भू-सुधार, नियोजन एवं विकास का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक अनुभव कराया जाता है।
  • प्रशिक्षण प्राप्त करते समय प्रशिक्षु अधिकारियों को व्यावहारिक स्तर पर आने वाली समस्याओं तथा शंकाओं का समाधान ज़िलाधीशों के मार्गदर्शन में होता है।
  • इस चरण का मुख्य उद्देश्य यह है कि प्रशिक्षु अधिकारी प्रशासनिक ढाँचे को समझें तथा वहाँ के लोगों, उनके प्रतिनिधियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों से संवाद कर विकास के अवसरों और नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों को समझ सकें।
  • राज्य स्तर पर प्रशिक्षण के अन्तिम चरण में पुनः राज्य प्रशासन अकादमी में 4 सप्ताह का संस्थागत प्रशिक्षण (चरण-II) दिया जाता है।
  • इस दौरान सभी प्रशिक्षु अपने राज्य प्रशिक्षण की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हैं।

व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण– II) :

  • राज्य में प्रशिक्षण समाप्त करके सभी आईएएस प्रशिक्षणार्थी पुनः मसूरी लौट आते हैं। फिर यहाँ आईएएस व्यावसायिक प्रशिक्षण चरण-II शुरू होता है जो 6 सप्ताह का होता है।
  • इस चरण में प्रशिक्षु क्षेत्र अध्ययन (Field work) के दौरान अर्जित व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर प्रशासन की अच्छाइयों और बुराइयों से सभी को अवगत कराते हैं।
  • इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य आईएएस अधिकारी के रूप में प्रशिक्षणार्थियों को शारीरिक-मानसिक रूप से तैयार करना, उनमें विश्लेषण, लेखन तथा संचार क्षमता विकसित करना, प्राप्त ज्ञान को अद्यतन करना, कम्प्यूटर शिक्षा देना, राजभाषा में योग्य बनाना तथा आत्मविश्वास से युक्त श्रेष्ठ अधिकारी बनाना है।
  • अंत में, प्रशिक्षु अधिकारियों की एक लिखित परीक्षा भी होती है जो अकादमी द्वारा आयोजित की जाती है। इसका संचालन यूपीएससी करता है।
  • इस परीक्षा में सफलता प्राप्त करने तथा एक वर्ष या 18 माह (प्रत्येक राज्य का वास्तविक काल भिन्न होता है) की सेवा पूर्ण कर लेने के पश्चात् ही सेवा में उनकी स्थायी नियुक्ति की जाती है।
  • इस प्रकार, औपचारिक आरंभिक प्रशिक्षण समाप्त हो जाता है तथा प्रत्येक अधिकारी को उसके निर्धारित कैडर में भेज दिया जाता है। हालाँकि, यह आरंभिक प्रशिक्षण ही होता है, इसके बाद ‘मिड कॅरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम’ के तहत सेवाकाल के बीच में भी कई बार प्रशिक्षण दिया जाता है।

नियुक्ति

  • नियुक्ति के पहले वर्ष में प्रशिक्षण का एक नियमित कार्यक्रम होता है। इसके पश्चात् उन्हें एक अनुभाग (Sub-division) सौंप दिया जाता है। उनके अनुभव एवं ज्ञान को समृद्ध करने के लिये प्रति दो वर्ष कार्य कर लेने के पश्चात् उनका स्थानांतरण एक ज़िले से दूसरे ज़िले में किया जाता है।
  • इसके अलावा, अवर सचिव (Under Secretary) के रूप में उन्हें लगभग 18 माह के लिये सचिवालय भेजा जाता है। इसके पश्चात् ही उन्हें ज़िलाधीश (District Magistrate) बनाया जाता है।
  • शुरुआती स्तर पर एक आईएएस अधिकारी को सब डिविज़नल ऑफिसर (SDO), सब डिविज़नल मजिस्ट्रेट (SDM), चीफ़ डेवलेपमेंट ऑफिसर (CDO) जैसे पदों पर नियुक्त किया जाता है। फिर इन्हें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अथवा ज़िलाधिकारी (DM), डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, डिप्टी कमिश्नर (DC) या डिविज़नल कमिश्नर के पद पर नियुक्त किया जाता है।
  • ये सभी वैसे पद हैं जो फील्ड पोस्टिंग के समय आईएएस अधिकारी ग्रहण करते हैं। इसके अतिरिक्त, इनकी नियुक्ति किसी स्वायत्त संगठन, पीएसयू, वर्ल्ड बैंक, एशियाई डेवलपमेंट बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भी की जा सकती है।
  • ये केन्द्रीय मंत्री के निजी सचिव के रूप में भी कार्य करते हैं।

पदोन्नति

  • लोक सेवा में पदोन्नति वरिष्ठता और/या योग्यता के आधार पर होती है।
  • समय के साथ प्रदर्शन के आधार पर इनकी प्रोन्नति होती है।
  • प्रोन्नति के बाद ये केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अंतर्गत कई पदों पर कार्य करते हैं। ये क्रमशः निम्नलिखित पदों का दायित्व संभालते हैं-
    अवर सचिव
    • भारत सरकार के अधीन उप-सचिव
    • भारत सरकार के अधीन निदेशक
    • भारत सरकार के अधीन संयुक्त सचिव / राज्य सरकार के अधीन सचिव
    • भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव / राज्य सरकार में मुख्य सचिव
    • भारत सरकार में सचिव / प्रधान सचिव
    • कैबिनेट सेक्रेटरी
  • कैबिनेट सेक्रेटरी बनना हर आईएएस अधिकारी का सपना होता है, लेकिन यह सौभाग्य बहुत ही कम अधिकारियों को अपने सेवा काल के अंतिम वर्षों में मिल पाता है।
  • आईएएस अधिकारी के रूप में इनकी सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना प्रधानमंत्री तथा विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के प्रधान सचिव के रूप में होती है|

सेवाकालीन प्रशिक्षण :

  • अकादमिक प्रशिक्षण के पश्चात् इन अधिकारियों को जो प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे ये कार्य करते हुए प्राप्त करते हैं।
  • आईएएस अधिकारियों को सेवा में रहते हुए 6-9 वर्ष, 10-16 वर्ष तथा 17-20 वर्ष की अवधि पर  सेवाकालीन प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण प्रायः अल्पावधिक होता है
  • इसी प्रकार, राज्य सेवाओं से आईएएस में पदोन्नत होने वाले अधिकारी भी मसूरी में 5 सप्ताह का आगमन प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।
  • भारतीय लोक प्रशासन संस्थान भी 38 सप्ताह का एम.फिल. स्तरीय ‘एडवांस्ड प्रोफेशन प्रोग्राम इन  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (APPPA) प्रदान करता है।

कार्य :

  • आईएएस अधिकारी विभिन्न देशों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं| ये सरकार के प्रतिनिधि के रूप में विभिन्न संधियों एवं समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिये अधिकृत (Authorized) होते हैं|
  • जब ये ज़िला स्तर पर कार्य करते हैं तो इन्हें ज़िलाधिकारी, कलेक्टर आदि नामों से जाना जाता है|
  • ये ज़िला स्तर के सभी कार्यों के लिये सीधे तौर पर उत्तरदायी होते हैं, चाहे वह विकास कार्य हो या कानून व्यवस्था या फिर आपदा प्रबंधन|
  • इन पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने का उत्तरदायित्व तो होता ही है, साथ ही सामान्य और राजस्व प्रशासन में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • एक आईएएस अधिकारी पर नीतियों के सफल क्रियान्वयन का दारोमदार तो होता ही है, साथ ही नीति निर्माण में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • समय के साथ इन्हें अलग-अलग विभागों में भी कार्य करना होता है जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल भिन्न होते हैं।
  • कार्य प्रकृति की यह विविधता जहाँ चुनौतियों से भरी होती है, वहीं इसमें अलग-अलग अनुभवों से गुज़रने का सुख भी मिलता है।
  • ज़िला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर ज़िले का मुख्य कार्यकारी, प्रशासनिक और राजस्व अधिकारी होता है। वह ज़िले में कार्य कर रही विभिन्न सरकरी एजेंसियों के मध्य आवश्यक समन्वय की स्थापना करता है|
  • ज़िला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर के कार्य एवं दायित्वों को कलेक्टर, ज़िला मजिस्ट्रेट, डिप्टी कमिश्नर, मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी और निर्वाचन अधिकारी के कार्यों और दायित्वों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है|
  • सचिवालयों में ये उप सचिव, अवर सचिव, मुख्य सचिव, प्रधान सचिव इत्यादि के दायित्व निभाते हैं|

 

 

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस)

भारतीय पुलिस सेवा (Indian Police Service- IPS) जिसे आम बोलचाल में ‘आईपीएस’ के नाम से जाना जाता है, एक अखिल भारतीय सेवा है। ब्रिटिश शासन के दौरान इसे ‘इंपीरियल पुलिस’ के नाम से जाना जाता था।
चयन प्रक्रिया

  • भारतीय पुलिस सेवा में अधिकारियों का चयन प्रत्येक वर्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित ‘सिविल सेवा परीक्षा’ के माध्यम से होता है।
  • इस परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों को उनके कुल अंकों और उनके द्वारा दी गई ‘सेवा वरीयता-सूची’ के आधार पर सेवा का आवंटन किया जाता है।
  • चूँकि, इस सेवा के साथ अनेक चुनौतियाँ और उत्तरदायित्व जुड़े होते हैं, इसलिये संघ लोक सेवा आयोग इस सेवा हेतु ऐसे अभ्यर्थियों का चुनाव करता है जो इसके अधिकतम अनुकूल हों।
  • इस सेवा से जुड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते देश के लाखों युवाओं में इसके प्रति ज़बरदस्त आकर्षण है। हर साल देश के लाखों युवा सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होते हैं।

शैक्षिक योग्यता:

  • सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिये उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से स्नातक (Graduate) होना अनिवार्य है|

शारीरिक योग्यता:

  • लंबाई: आईपीएस में चयनित होने के लिये पुरुष उम्मीदवारों की लंबाई कम से कम 165 सेंटीमीटर तथा महिला उम्मीदवारों की लंबाई कम-से-कम 150 सेंटीमीटर होनी चाहिये|
  • अनुसूचित जनजाति (STs) वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों की लंबाई कम से कम 160 सेंटीमीटर तथा महिला उम्मीदवारों की लंबाई कम-से-कम 145 सेंटीमीटर होनी आवश्यक है|
  • चेस्: पुरुष एवं महिला उम्मीदवारों की चेस्ट क्रमशः कम-से-कम 84 एवं 79 सेंटीमीटर होनी चाहिये|
  • आई साइट: स्‍वस्‍थ आँखों का विज़न 6/6 या 6/9 होना चाहिये, जबकि कमज़ोर आँखों का विज़न 6/2 या 6/9 होना चाहिये|

प्रशिक्षण:

  • भारतीय पुलिस सेवा प्रशिक्षण की निम्नलिखित अवस्थाएँ होती हैं-
    1. आधारभूत प्रशिक्षण – 4 माह ( राष्ट्रीय अकादमी, मसूरी में)
    2. संस्थागत/ व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण- I) – 12 माह (पुलिस अकादमी, हैदराबाद में)
    3. व्यावहारिक प्रशिक्षण – 8 माह (आवंटित राज्य के किसी ज़िले में)
    4. संस्थागत/ व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण- II) – 3 माह (पुलिस अकादमी, हैदराबाद में)
  • ‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी (उत्तराखंड)’ में 16 सप्ताह का आधारभूत प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में चयनित उम्मीदवारों को ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद’ में प्रशिक्षण दिया जाता है जो एक वर्ष का होता है।
  • यहाँ इन प्रशिक्षु अधिकारियों को सर्वप्रथम संस्थागत प्रशिक्षण चरण-I में 4 सप्ताह तक भारतीय दण्ड संहिता, अपराध शास्त्र, भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की सूक्ष्म जानकारी दी जाती है।
  • यहाँ इन अधिकारियों को शारीरिक व्यायाम, ड्रिल तथा हथियार चलाने पर विशेष ध्यान देने को कहा जाता है।
  • विभिन्न प्रकार के हथियारों का प्रशिक्षण दिलाने के लिये इन अधिकारियों को सीमा सुरक्षा बल के इंदौर (मध्य प्रदेश) स्थित ‘सेण्ट्रल स्कूल फॉर वेपंस एण्ड टैक्टिक्स’ में 28 दिन रखा जाता है, जहाँ इन्हें विभिन्न छोटे-बड़े हथियारों को  खोलना, साफ करना तथा पुनः जोड़ना सिखाया जाता है।
  • इसके अतिरिक्त टैक्टिक्स (व्यूह रचना) के अंतर्गत नक्शा पढ़ना, दबिश देना, रात्रि विचरण, खोज तथा घात लगाना इत्यादि सिखाया जाता है।
  • इसके साथ-साथ इन प्रशिक्षु अधिकारियों को घुड़सवारी, उग्र भीड़ नियंत्रण, अग्निशमन, जनता से मित्रवत व्यवहार, तैराकी, फोटोग्राफी, पर्वतारोहण, वाहन चलाना, आतंकवाद नियंत्रण, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा, बेतार संचार प्रणाली तथा साम्प्रदायिक दंगों से संबंधित आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
  • संस्थागत प्रशिक्षण चरण-I के पश्चात् प्रशिक्षु अधिकारियों को एक वर्ष के लिये पुलिस अधीक्षक, उपाधीक्षक, वृत्त निरीक्षक तथा थानाधिकारी के साथ नियुक्त किया जाता है। यहाँ प्रशिक्षु अधिकारी विभिन्न प्रकार के आपराधिक मामलों की जाँच तथा कार्यालयी प्रक्रियाओं व थानों की कार्यप्रणाली की व्यावहारिक जानकारी हासिल करते हैं|
  • व्यावहारिक प्रशिक्षण के पश्चात् पुनः अकादमी में इनका संस्थागत प्रशिक्षण चरण-II शुरू होता है। एक वर्ष का प्रशिक्षण पूरा करने के उपरान्त परिवीक्षाधीन अधिकारियों को यूपीएससी द्वारा संचालित एक परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है तत्पश्चात् इन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण से सम्बन्धित (आवंटित) राज्य में ‘सहायक पुलिस अधीक्षक’ के पद पर नियुक्त कर दिया जाता है।
  • इस प्रकार आरंभिक औपचारिक प्रशिक्षण समाप्त हो जाता है तथा प्रत्येक अधिकारी को उसके निर्धारित कैडर में भेज दिया जाता है। हालाँकि,यह प्रारंभिक प्रशिक्षण ही होता है, इसके बाद ‘मिड कॅरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम’ के तहत सेवाकाल के बीच में भी कई बार प्रशिक्षण दिया जाता है।

नियुक्ति

  • प्रशिक्षण पूरा होने के बाद प्रशिक्षु अधिकारी को जो राज्य कैडर दिया जाता है, उसी राज्य के किसी एक ज़िले के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में प्रशिक्षु अधिकारी को एक साल का कार्य-प्रशिक्षण लेना होता है। इसके बाद इन्हें सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में दो वर्ष तक कार्य करना होता है।
  • सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य करते हुए, अधिकारी का उत्तरदायित्व पुलिस उपाधीक्षक के समकक्ष होता है।

पदोन्नति:

  • पदोन्नति के द्वारा आईपीएस अधिकारी सहायक पुलिस अधीक्षक के पद से पुलिस महानिदेशक तक पहुँच सकता है। पुलिस महानिदेशक राज्य पुलिस बल का मुखिया होता है।
  • इसके अतिरिक्त आईपीएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भारत सरकार के ख़ुफ़िया विभाग इंटेलिजेन्स ब्यूरो (आईबी)और सीबीआई में भी नियुक्त किया जाता हैं।
  • दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में कानून और व्यवस्था को बनाए रखना पुलिस बल की विशेष ज़िम्मेदारी है। इन शहरों में पुलिस अधिकारी को सहायक पुलिस आयुक्त(ACP),अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त(ADCP),पुलिस उपायुक्त (DCP), संयुक्त पुलिस आयुक्त और पुलिस आयुक्त (CP) कहा जाता है। पुलिस आयुक्त(CP) इन शहरों के पुलिस बल का प्रमुख होता है।
  • आईपीएस अधिकारी के रूप में इनकी सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना सीबीआई, आईबी इत्यादि केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुख तथा विभिन्न राज्यों के पुलिस महानिरीक्षक के रूप में होती है|

सेवाकालीन प्रशिक्षण:

  • सेवा में रहते हुए उच्च पदों को धारण करने की क्षमता तथा परिवर्तित परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाने के लिये भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारिओं को सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान तथा अन्य संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • सेवाकालीन प्रशिक्षण में मुख्यतः प्रशासनिक प्रक्रिया, जन सम्पर्क, दंगा नियंत्रण, मानवाधिकार, उग्र आंदोलन, प्राकृतिक आपदाएँ, दुर्घटनाएँ तथा प्रेस से संबंध इत्यादि विषय सम्मिलित होते हैं।

कार्य:

  • सहायक पुलिस अधीक्षक(ASP) के रूप में कार्य करते हुए इनकी जवाबदेहिता अपने वरिष्ठ अधिकारी- पुलिस अधीक्षक(SP), वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक(SSP), उप पुलिस महानिरीक्षक(DIG) के प्रति होती है।
  • आईपीएस की पदस्थापना पुलिस अधीक्षक (SP) के रूप में होती है जो सार्वजनिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था, अपराध नियंत्रण एवं निवारण, ट्रैफिक नियंत्रण इत्यादि के लिये ज़िम्मेदार होता है|
  • ये अन्य केंद्रीय पुलिस संगठनों जैसे- सीबीआई, बीएसएफ, सीआरपीएफ इत्यादि में भी अपनी सेवाएँ देते हैं|
  • दिन-प्रतिदिन के कार्यों में इन्हें सामान्यत: लोक शांति और व्यवस्था, अपराध की रोकथाम, जाँच और पहचान, वीआईपी सुरक्षा, तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार के मामले, सार्वजनिक जीवन, आपदा प्रबंधन, सामाजिक-आर्थिक कानून, जैव विविधता और पर्यावरण कानूनों आदि के संरक्षण आदि पर विशेष ध्यान देना होता है|
  • आईपीएस अधिकारी पुलिस बलों में मूल्यों और मानदंडों को विकसित करने का कार्य भी करता है |
  • तेज़ी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप कानून और न्याय,  अखंडता, संवेदनशीलता, मानवाधिकार इत्यादि  की रक्षा करना और जनता में पुलिस के प्रति विश्वास बढ़ाने में आईपीएस अधिकारी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|

 

 

भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस)

भारतीय विदेश मंत्रालय के कार्यों के संचालन के लिये एक विशेष सेवा वर्ग का निर्माण किया गया है जिसे भारतीय विदेश सेवा  (Indian Foreign Service- IFS) कहते हैं। यह भारत के पेशेवर राजनयिकों का एक निकाय है। यह सेवा भारत सरकार की केंद्रीय सेवाओं का हिस्सा है। भारत के विदेश सचिव, भारतीय विदेश सेवा के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। यह सेवा अब संभ्रान्त परिवारों, राजा-रजवाड़ों, सैनिक अफसरों आदि तक ही सीमित न रहकर सभी के लिये खुल गई है। सामान्य नागरिक भी अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर इस सेवा का हिस्सा बन सकता है।

चयन प्रक्रिया:

  • भारतीय विदेश सेवा में चयन प्रत्येक वर्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित ‘सिविल सेवा परीक्षा’ के द्वारा होता है।
  • सिविल सेवा परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों को उनके द्वारा प्राप्त कुल अंकों और उनके द्वारा दी गई सेवा वरीयता के अनुसार ही पदों का आवंटन किया जाता है।
  • इस सेवा के साथ अनेक चुनौतियाँ और उत्तरदायित्व जुड़े हुए हैं, इसलिये संघ लोक सेवा आयोग इस सेवा के लिये ऐसे अभ्यर्थियों  का ही चुनाव करता है जो इस सेवा के अनुकूल हों।
  • हाल के वर्षों में भारतीय विदेश सेवा में प्रति वर्ष लगभग 20 व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है। सेवा की वर्तमान कैडर संख्या लगभग 600 अधिकारियों की है,जिनमें लगभग 162 अधिकारी विदेशों में भारतीय मिशन एवं देश में विदेशी मामलों के मंत्रालय में विभिन्न पदों पर आसीन हैं।

शैक्षिक योग्यता:

  • उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से स्नातक (Graduate) होना अनिवार्य है|

प्रशिक्षण:

  • भारतीय विदेश सेवा के लिये चयनित नए सदस्यों को तीन वर्षीय (36 महीनों की अवधि) महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम से होकर गुज़रना पड़ता है। यह प्रशिक्षण निम्नलिखित चरणों में संपन्न होता है-
    1. आधारभूत प्रशिक्षण – 4 माह (राष्ट्रीय अकादमी, मसूरी में)
    2. व्यावसायिक प्रशिक्षण – 12 माह (ज़िला कार्यालय और अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल, नई दिल्ली में)
    3. व्यावहारिक प्रशिक्षण – 6 माह (विदेश मन्त्रालय के अंतर्गत)
    4. परिवीक्षा प्रशिक्षण – 14 माह (विदेश स्थित उच्चायुक्त/दूतावास में)
  • सर्वप्रथम इन प्रशिक्षु अधिकारियों को ‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी’ में 4 माह का आधारभूत प्रशिक्षण दिया जाता है, जहाँ कई अन्य विशिष्ट भारतीय सिविल सेवा संगठनों के सदस्यों को भी प्रशिक्षित किया जाता है।
  • नए सदस्य एक परिवीक्षा अवधि से गुज़रते हैं, इस दौरान इन्हें परिवीक्षार्थी (प्रोबेशनर) कहा जाता है।
  • लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद परिवीक्षार्थी आगे के प्रशिक्षण के साथ-साथ विभिन्न सरकारी निकायों के साथ संलग्न होने और भारत एवं विदेश में भ्रमण के लिये नई दिल्ली स्थित ‘विदेश सेवा संस्थान’ में दाखिला लेते हैं।
  • इन प्रशिक्षु अधिकारियों को ‘इंडियन स्कूल ऑफ इण्टरनेशनल स्टडीज़, नई दिल्ली’ में 4 माह का विदेश नीति तथा कार्य-प्रणाली, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध तथा भाषा की जानकारी का प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • इसके पश्चात् प्रशिक्षु अधिकारियों को 6 माह के लिये किसी ज़िला प्रशासन से संलग्न किया जाता है ताकि ये दायित्व के व्यावहारिक सम्पर्क में आने के योग्य हो जाएँ। साथ ही, इन्हें कुछ समय के लिये विदेश मन्त्रालय के सचिवालय में भी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता हैं।
  • आईएफएस के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाषाओं (हिन्दी तथा एक विदेशी भाषा) और ऐसे विषयों के अध्ययन पर बल दिया जाता है जिनका ज्ञान प्राप्त करना एक आईएफएस अधिकारी के लिये आवश्यक समझा जाता है।
  • नए सदस्यों को कुछ दिनों के लिये सेना की यूनिट में तथा ‘भारत दर्शन’ के लिये भी भेजा जाता है।
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर अधिकारी को अनिवार्य रूप से एक विदेशी भाषा (Context Free Language – CFL) सीखने का जिम्मा दिया जाता है।
  • एक संक्षिप्त अवधि तक विदेश मंत्रालय के साथ संलग्न रहने के बाद अधिकारी को विदेश में एक भारतीय राजनयिक मिशन पर नियुक्त किया जाता है जहाँ की स्थानीय भाषा ‘सीएफएल’ हो। वहाँ  अधिकारी भाषा का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और फिर इनसे सीएफएल में दक्षता प्राप्त करने और एक परीक्षा उत्तीर्ण करने की अपेक्षा की जाती है, उसके बाद ही इन्हें सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाती है।

नियुक्ति एवं पदोन्नति:

    • आईएफएस अधिकरियों की नियुक्ति सामान्यत: दूतावास, वाणिज्य दूतावास एवं विदेश मंत्रालय में की जाती है।
    • ये विदेशों में अपनी सेवा तृतीय सचिव के तौर पर आरंभ करते हैं और सेवा में स्थायी होते ही द्वितीय सचिव के पद पर प्रोन्नत कर दिये जाते हैं।
    • आईएफएस अधिकारी की सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना राजदूत या विदेश सचिव के रूप में होती है|  इनका पदक्रम इस प्रकार है-
    • दूतावास में:

तृतीय सचिव (प्रवेश स्तर)
द्वितीय सचिव (सेवा में पुष्टि के बाद पदोन्नति)
प्रथम सचिव
सलाहकार
मिशन के उपाध्यक्ष/ उप उच्चायुक्त/ उप स्थायी प्रतिनिधि
राजदूत/उच्चायुक्त/स्थायी प्रतिनिधि

    • वाणिज्य दूतावास में:

उप वाणिज्य दूत(Vice Consul)
वाणिज्य दूत(Consul)
महावाणिज्य दूत(Consul-General)

    • विदेश मंत्रालय में:

अवर सचिव(Upper Secretary)
उप सचिव(Deputy Secretary)
निदेशक(Director)
संयुक्त सचिव(Joint Secretary)
अतिरिक्त सचिव(Additional Secretary)
सचिव(Secretary)

कार्य

  • वृत्तिक (Professional) राजनयिक के तौर पर आईएफएस अधिकारी से यह आशा की जाती है कि वह विभिन्न मुद्दों पर देश और विदेश दोनों में भारत के हितों का ध्यान रखेगा और इसे आगे बढ़ाएगा। इनमें द्विपक्षीय राजनीतिक और आर्थिक सहयोग, व्यापार और निवेश संवर्द्धन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, प्रेस और मीडिया संपर्क तथा सभी बहुपक्षीय मुद्दे शामिल हैं।
  • आईएफएस अधिकारी मुख्यत: देश के बाह्य मामलों जैसे- कूटनीति, व्यापार, सांस्कृतिक संबंधों, प्रवास संबंधित मामलों आदि से संबंधित कार्यों को संपादित करते हैं|
  • ये भारत की विदेश नीति के निर्माण तथा क्रियान्वयन में संलग्न रहते हैं|
  • ये अपने दूतावासों, उच्चायोगों और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठनों के स्थायी मिशनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं|
  • नियुक्त किये जाने वाले देश में भारत के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इनका मुख्य उद्देश्य होता है।
  • अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के व्यक्तियों सहित मेज़बान राष्ट्र और उसकी जनता के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने में इनकी मुख्य भूमिका होती है।
  • ये विदेश में उन घटनाक्रमों की सही-सही जानकारी देते हैं, जो भारत के नीति-निर्माण को प्रभावित कर सकती हैं।
  • मेज़बान राष्ट्र के प्राधिकारियों के साथ विभिन्न मुद्दों पर समझौता-वार्ता करने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं की होती है।
  • विदेश मंत्रालय, भारत के विदेश संबंधों से जुड़े सभी पहलुओं के लिये उत्तरदायी है। क्षेत्रीय प्रभाग, द्विपक्षीय राजनीतिक और आर्थिक कार्य देखते हैं, जबकि क्रियात्मक प्रभाग,  नीति-नियोजन, बहुपक्षीय संगठनों, क्षेत्रीय दलों, विधिक मामलों, निःशस्त्रीकरण, नवाचार, भारतीय डायस्पोरा, प्रेस और प्रचार, प्रशासन तथा अन्य कार्यों को देखते हैं।

 

 

इंटरव्यू

परिचय

  • साक्षात्कार (Interview) किसी भी परीक्षा का अंतिम एवं महत्त्वपूर्ण चरण होता है।
  • इसमें न तो प्रारंभिक परीक्षा की तरह सही उत्तर के लिये विकल्प दिये जाते हैं और न ही मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्रों की तरह अपनी सुविधा से प्रश्नों के चयन की सुविधा होती है। साक्षात्कार में आपको हर प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य होता है, साथ ही आपके द्वारा किसी भी प्रश्न के लिये दिये गए उत्तर पर प्रति-प्रश्न (Counter-question) भी पूछे जाने की संभावना रहती है। आपके द्वारा दिये गए किसी भी गलत या हल्के उत्तर का ‘नैगेटिव मार्किंग’ जैसा ही प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। किसी भी उम्मीदवार के लिये साक्षात्कार के चरण की सबसे मुश्किल बात यह होती है कि प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा के विपरीत इसके लिये कोई निश्चित पाठ्यक्रम निर्धारित नहीं है। यही वजह है कि साक्षात्कार के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों का दायरा बहुत व्यापक होता है।
  • सिविल सेवा परीक्षा में इंटरव्यू के लिये कुल 275 अंक निर्धारित हैं। सामान्य रूप से देखें तो मुख्य परीक्षा के अंकों (1750 अंक) की तुलना में इस चरण के लिये निर्धारित अंक कम अवश्य हैं लेकिन अंतिम चयन एवं पद निर्धारण में इंटरव्यू के अंकों की विशेष भूमिका रहती है।
  • मुख्य परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों को सामान्यत: एक महीने के बाद इंटरव्यू के लिये बुलाया जाता है।
  • वस्तुतः सामान्य मान्यता यह है कि इंटरव्यू के दौरान अभ्यर्थियों के व्यक्तित्व का परीक्षण किया जाता है, जिसमें आयोग द्वारा चयनित इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों द्वारा उम्मीदवारों से मौखिक प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनका उत्तर भी उम्मीदवार को मौखिक रूप में ही देना होता है। हालाँकि, कई बार ऐसा भी हुआ है कि कुछ राज्य लोक सेवा आयोगों में इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों ने उम्मीदवार से कुछ लिखने की भी अपेक्षा की। इंटरव्यू की  प्रक्रिया अभ्यर्थियों की संख्या के अनुसार एक से अधिक दिनों तक चलती है।
  • मुख्य परीक्षा एवं इंटरव्यू में प्राप्त अंकों के योग के आधार पर अंतिम रूप से मेधा सूची (Merit list) तैयार की जाती है।
  • इस चरण में शामिल किये गए सभी अभ्यर्थियों का इंटरव्यू समाप्त होने के सामान्यत: एक सप्ताह पश्चात् अंतिम रूप से चयनित उम्मीदवारों की सूची जारी की जाती है।

इंटरव्यू की तैयारी क्यों करें?

  • मुख्य परीक्षा देने के बाद परीक्षार्थियों को यह उम्मीद रहती है कि उन्हें इंटरव्यू देने का अवसर मिलेगा। उनमें से कुछ मुख्य परीक्षा के तुरंत बाद इंटरव्यू की तैयारी शुरू कर देते हैं जबकि कुछ मुख्य परीक्षा के परिणाम का इंतज़ार करते हैं और परीक्षा में सफल होने पर ही इंटरव्यू के बारे में सोचना शुरू करते हैं।
  • हालाँकि, यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि मुख्य परीक्षा परिणाम आने से पहले ही तैयारी शुरू करने वाले अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में अनिवार्यतः ज़्यादा अंक मिलते हैं, लेकिन इस बात की संभावना ज़रूर रहती है क्योंकि इंटरव्यू के अंक कई कारकों पर निर्भर होते हैं जिनमें तैयारी एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
  • ऐसा हो सकता है कि बहुत कम तैयारी के बावजूद कोई उम्मीदवार काफी अच्छे अंक हासिल कर ले जबकि 3-4 महीने तैयारी में जुटे रहने के बावजूद कोई उम्मीदवार अच्छे अंक हासिल न कर पाए।
  • इस अंतराल की वज़ह यह है कि इंटरव्यू की तैयारी वस्तुतः जीवन के शुरुआती चरण से ही निरंतर चलती रहती है। जिन उम्मीदवारों को घर, स्कूल और कॉलेज में विविध अनुभव और अवसर हासिल हुए होते हैं, उनका व्यक्तित्व प्रायः ज़्यादा विकसित हो जाता है। ऐसे उम्मीदवार अगर बिना किसी तैयारी के भी इंटरव्यू देने चले जाएँ तो इस बात की पर्याप्त संभावना बनती है कि वे अच्छे अंक हासिल कर लेंगे।
  • इंटरव्यू की तैयारी करने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उम्मीदवार को अच्छे अंक मिल ही जाएंगे और तैयारी नहीं करने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उसे खराब अंक ही मिलेंगे। फिर भी एक बात तय है कि उम्मीदवार के व्यक्तित्व का विकास जिस भी स्तर पर हुआ है, अगर वह व्यवस्थित तैयारी करेगा तो अपने स्तर पर सामान्यतः मिलने वाले अंकों में कुछ अंकों का इज़ाफा तो कर ही लेगा।
  • हमारा उद्देश्य उम्मीदवारों को यह समझाना है कि उन्हें बिल्कुल भी समय व्यर्थ नहीं करना चाहिये। हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों को तो वैसे भी इंटरव्यू में औसतन कम अंक प्राप्त होते हैं क्योंकि उन्हें बचपन से वैसा माहौल ही नहीं मिला होता है जिसमें इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों को पसंद आने वाला व्यक्तित्व अपने आप उभरता है। उनके लिये तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि मुख्य परीक्षा के तुरंत बाद इंटरव्यू की तैयारी में जुट जाएँ।
  • ध्यान रहे कि अंतिम परिणाम में सिर्फ 1 अंक के अंतर से भी कई बार 10 रैंक तक का फर्क पड़ जाता है। इसलिये अगर अभी की मेहनत से 20-25 या अधिक अंकों का इज़ाफा किया जा सकता है तो इस अवसर को छोड़ना मूर्खता ही होगी।
  • अतः श्रेयस्कर यही होगा कि आप अनुकूल समय प्रंबंधन द्वारा सही दिशा में तैयारी आरंभ कर दें।

इंटरव्यू की तैयारी कैसे करें?

  • उम्मीदवारों को यह सवाल बार-बार परेशान करता है कि इतनी कठिन परीक्षा की तैयारी कैसे की जाए- क्या पढ़ा जाए और क्या नहीं? सिर्फ़ पढ़ा जाए या किताबों से बाहर भी झाँका जाए? आत्मविश्वास कैसे लाया और बढ़ाया जाए? ऐसा व्यक्तित्व कैसे गढ़ा जाए कि उस आधे घंटे के भीतर हम इंटरव्यू पैनल के सदस्यों को सम्मोहित कर पाने में सफल हो जाएँ।
  • इसके लिये सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य आखिर किस आधार पर उम्मीदवारों का मूल्यांकन करते हैं? कुछ लोग सोचते हैं कि हम जितने प्रश्नों के सही जवाब दे पाते हैं, उसी के अनुपात में हमें अंक मिलते हैं; यह इंटरव्यू को लेकर व्याप्त सबसे बड़ा भ्रम है।
  • सच यह है कि कुछ लोग लगभग सभी सवालों के सही जवाब देने के बावजूद 25-30% अंकों पर अटक जाते हैं जबकि कुछ उम्मीदवार दस से अधिक प्रश्नों के उत्तर में ‘सॉरी’ बोलने के बाद भी 65-70% तक अंक अर्जित कर लेते हैं।
  • फिर प्रश्न उठता है कि आखिर किन कसौटियों के आधार पर इंटरव्यू में अंक मिलते हैं? क्या यह चेहरे की सुंदरता और ड्रेसिंग सेंस से तय होता है? क्या सदस्य हमारी भाषा-शैली और हाव-भाव से हमारा मूल्यांकन करते हैं? क्या अंकों का सीधा संबंध हमारे उत्तरों की गुणवत्ता से होता है? क्या जीवन और विभिन्न मुद्दों के प्रति हमारा नज़रिया इसमें केंद्रीय भूमिका निभाता है?
  • सच बात यह है कि ये सभी चीज़ें संयुक्त रूप से इंटरव्यू बोर्ड पर असर डालती हैं। हालाँकि यह दावा करना कठिन है कि इनका अनुपात क्या होगा? हर उम्मीदवार के मामले में इन तत्त्वों का अनुपात अलग-अलग हो सकता है।
  • संभव है कि कोई उम्मीदवार तथ्यों में कमज़ोर हो, दिखने में कम आकर्षक हो पर अपने सुलझे हुए दृष्टिकोण की बदौलत बोर्ड पर ठीक-ठाक प्रभाव कायम करने में सफल हो जाए। इसी तरह, यह भी संभव है कि कोई उम्मीदवार अपने आकर्षक चेहरे, प्रभावी ड्रेसिंग कौशल तथा जादुई अभिव्यक्ति सामर्थ्य के सहारे अपनी ज्ञान संबंधी कमियों को एक हद तक ढकने में कामयाब हो जाए।
  • इसके लिये आवश्यक है कि उम्मीदवार सर्वप्रथम अपने बेहतर व कमज़ोर पक्षों की पहचान कर लें, कमज़ोर पक्षों को सुधारने का निरंतर प्रयास करें और इंटरव्यू के समय कोशिश करें कि बेहतर पक्ष ज़्यादा से ज़्यादा सामने आएँ जबकि कमज़ोर पक्ष यथासंभव छिपे रहें।
  • सामान्यत: जिस कसौटी पर इंटरव्यू में अंक तय होते हैं, वह सिर्फ यह है कि उम्मीदवार की उपस्थिति में बोर्ड के सदस्यों ने कैसा महसूस किया? उन्हें इंटरव्यू का समय पूरा करने के लिये संघर्ष करना पड़ा या उन्हें पता ही नहीं चला कि समय कब गुज़र गया। उन्हें सिर्फ बताने का मौका मिला या कुछ नया सीखने का भी? उन्हें रोचकता का अनुभव हुआ या नीरसता का? उन्हें उम्मीदवार के उत्तरों में घिसी-पिटी बातें मिलीं या कुछ नया और मौलिक भी मिला? उन्हें उम्मीदवार डींगें हाँकने वाला और झूठा लगा या ईमानदारी से अपनी कमियाँ स्वीकार लेने वाला विनम्र और सच्चा व्यक्ति लगा? ये सब चीज़ें मिलकर उस अनुभूति या ‘मूड’ का निर्माण करती हैं जो उम्मीदवार का परिणाम तय करता है।
  • फिर भी, अगर इन तत्त्वों का अनुपात तय करना ही है तो मैं कहूंगा कि आकर्षक चेहरा और ड्रेसिंग सेंस शायद 5-10% से अधिक फायदा नहीं पहुँचाते होंगे। हाँ, अगर ड्रेसिंग सेंस बहुत ख़राब हो तो यह ज़्यादा नुकसान कर सकता है।
  • अभिव्यक्ति कौशल की भूमिका इससे ज़्यादा होती है। बहुत अच्छी अभिव्यक्तिगत क्षमता आपको 20-25% तक का फायदा पहुँचा सकती है तो इसका अभाव इतना या इससे अधिक नुकसान पहुँचा सकता है। अगर बोर्ड के सदस्य परिपक्व हों तो उम्मीदवार की तथ्यात्मक जानकारी भी 10-15% से ज़्यादा असर नहीं डालतीं। हाँ, अगर उम्मीदवार अपने क्षेत्र से संबंधित या एकदम सरल प्रश्नों के उत्तर न दे पाए तो नुकसान ज़्यादा अवश्य हो जाता है।
  • सबसे अधिक महत्त्व होता है उम्मीदवार के नज़रिये का, अर्थात् किसी मुद्दे पर वह कितने व्यापक और संतुलित तरीके से सोच पाता है, किसी नई और तात्कालिक समस्या को सुलझाने के लिये सही और त्वरित निर्णय कर पाता है या नहीं, मुद्दे के व्यावहारिक और सैद्धांतिक पक्षों और उनके अंतर्संबंधों को कितनी गहराई से समझ पाता है इत्यादि।
  • उम्मीदवारों को हमारा यह सुझाव है कि आप जब भी किसी विवादास्पद मुद्दे पर विचार करें तो तटस्थ होकर उसके दोनों पक्षों की गहराई में जाएँ। विचार करते समय अपने हितों और नुकसानों को चेतना पर हावी न होने दें। कागज़ पर वह विषय लिखकर दो हिस्सों में पक्ष और विपक्ष के तर्क व तथ्य नोट करें। ज़्यादा तर्क न सूझें तो इंटरनेट का सहारा लें। दोस्तों से उस मुद्दे पर वाद-विवाद या विमर्श करें। अंत में दो तीन वाक्यों में अपनी राय लिख लें।
  • जब आप यह प्रक्रिया 15-20 बार दोहरा लेंगे तो खुद पाएंगे कि आपका नज़रिया संतुलित तथा परिपक्व होने लगा है और आपके अंदर अदभुत आत्मविश्वास का विकास हुआ है।

इंटरव्यू की तैयारी के विविध पक्ष

  • इंटरव्यू की तैयारी को कुल 4 भागों में बाँटकर देखा जा सकता है-
    1. ज्ञान पक्ष
    2. दृष्टिकोण पक्ष
    3. अभिव्यक्ति पक्ष
    4. वेशभूषा आदि की तैयारी

ज्ञान पक्ष:

  • यह इंटरव्यू की तैयारी के दौरान सबसे अधिक तनाव पैदा करने वाला पक्ष है। कारण यह है कि लगभग हर उम्मीदवार के बायोडाटा में इतने सारे पक्ष लिखे होते हैं कि अगर वह उन सभी क्षेत्रों से जुड़ी जानकारियाँ याद करना चाहे तो यह प्रायः असंभव हो जाता है।
  • इस कठिनाई के कारण कुछ पक्षों की तैयारी छूट ही जाती है किंतु इंटरव्यू तक लगातार यह भय बना रहता है कि कहीं उसी हिस्से से प्रश्न न पूछ लिये जाएँ जिसकी तैयारी कम हुई है। यहाँ सवाल है कि इस भय से मुक्ति कैसे मिल सकती है?
  • सबसे पहले यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान या जानकारियों के स्तर पर उम्मीदवार की तैयारी चाहे जितनी भी हो, अगर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य ठान लेंगे तो उसे किसी न किसी क्षेत्र में उलझा ही देंगे। उनके लिये यह अनुमान करना बहुत मुश्किल नहीं होता कि उम्मीदवार किस क्षेत्र में कमज़ोर है।
  • अगर वो उम्मीदवार को परेशान करना चाहें तो कमज़ोर क्षेत्र का अनुमान करके लगातार उसी से प्रश्न पूछते रहेंगे ताकि उम्मीदवार पूरी तरह पराजय स्वीकार कर ले। इसलिये, तैयारी के स्तर पर हमें अपना उद्देश्य यह नहीं रखना चाहिये कि एक भी प्रश्न हमारी परिधि से बाहर का न हो। उद्देश्य सिर्फ इतना होना चाहिये कि सामान्यतः हम सभी प्रश्नों के उत्तर दे सकें, और अगर हमसे कोई प्रश्न छूटे तो वह केवल वही होना चाहिये जो अपनी प्रकृति में बेहद जटिल हो। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य भी यह समझते हैं कि कोई उम्मीदवार सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता।
  • इंटरव्यू के दौरान कई बार ऐसी भी स्थिति बन जाती है कि बोर्ड के किसी सदस्य द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर बाकी सदस्यों को भी नहीं पता होते। ऐसी स्थिति में वे सहज रूप से यह समझते हैं कि अगर उम्मीदवार बहुत कठिन और अप्रचलित प्रश्न का उत्तर नहीं दे पा रहा है तो यह उसके प्रति नकारात्मक राय बनाने का पर्याप्त कारण नहीं है।
  • बहुत कठिन प्रश्नों पर तो बोर्ड की संवेदना अपने आप उम्मीदवार के पक्ष में मुड़ जाती है। हाँ, अगर प्रश्न आसान है या उम्मीदवार की पृष्ठभूमि से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है तो उसका जवाब न देना अपराध जैसा मामला बनता है और उम्मीदवार को उसकी सज़ा भुगतनी पड़ सकती है।
  • चूँकि ज्ञान या जानकारियों का पक्ष अनंत है, इसलिये सबसे पहले यही समझना चाहिये कि किसी क्षेत्र विशेष पर उम्मीदवार को कितना पढ़ना चाहिये और कितना हिस्सा छोड़ देना चाहिये? अगर इस विवेकशीलता का प्रयोग न किया जाए तो एक विशेष समस्या सामने आती है।
  • उम्मीदवार सबसे पहले जिस विषय को उठाता है, अपना अधिकांश समय उसी में गँवा देता है क्योंकि उसे यह संतोष ही नहीं मिलता कि उस क्षेत्र में उसकी तैयारी पूरी हो गई है। इस तरीके से पढ़ते-पढ़ते वह 10-12 प्रमुख क्षेत्रों में से 2-3 को ही ठीक से तैयार कर पाता है और बाकी क्षेत्र छूट जाते हैं।
  • आपके साथ यह दुर्घटना न हो, इसके लिये ज़रूरी है कि ‘क्या पढ़ना है’ से ज़्यादा स्पष्ट समझ इस विषय पर हो कि ‘क्या नहीं पढ़ना है’।
  • सबसे पहले उन विषयों की सूची बना लीजिये जो आपके बायोडाटा में दिखाई पड़ते हैं। इन विषयों में आपका वैकल्पिक विषय तो है ही, साथ ही सामान्य अध्ययन के प्रमुख खंड, आपकी अकादमिक पृष्ठभूमि के विषय, आपकी रुचियाँ, आपका गृह राज्य, गृह जनपद आदि सभी शामिल हैं।
  • अपने बायोडाटा को बोर्ड सदस्य की निगाह से कई बार पढ़िये और सोचिये कि उसकी नज़र किस-किस शब्द पर टिक सकती है? ऐसे सभी शब्दों को रेखांकित कर लीजिये और मानकर चलिये कि आपको उन सभी पर किसी न किसी मात्रा में तैयारी करने की ज़रूरत है।
  • इसके बाद एक-एक करके विभिन्न विषयों को उठाइये और संभावित प्रश्नों की सूची बनाइये। इस सूची को तीन भागों में बाँटकर तैयार कीजिये-
    1. अत्यधिक संभावित प्रश्न
    2. सामान्य संभावित प्रश्न
    3. कम संभावित प्रश्न
  • कौन सा प्रश्न इंटरव्यू के लिये कितना संभावित है, इसका निर्धारण करते हुए सभी विषयों को बोर्ड सदस्यों की निगाह से देखने की आदत विकसित कीजिये।
  • बेहतर होगा कि आप इन प्रश्नों की सूची बनाने में सिर्फ अपने विवेक से काम लेने की बजाय अपने कुछ साथियों को भी शामिल कर लें- खासतौर पर उन्हें जो आपके साथ इंटरव्यू की तैयारी कर रहे हैं और वह विषय या क्षेत्र उनके बायोडाटा में भी शामिल है।
  • ये सूचियाँ इस तरह से बनाई जानी चाहियें कि बाद में भी नए प्रश्नों को शामिल करने की संभावना बनी रहे।
  • अगर आप अपने बायोडाटा के हर क्षेत्र पर ऐसी सूची बना लेंगे तो संभवतः आपके पास 500-700 प्रश्न इकट्ठे हो जाएंगे जिनमें से 100-150 प्रश्न ‘अत्यधिक संभावित’ वर्ग के होंगे। बेहतर होगा कि सबसे पहले आप इन्हीं 100-150 प्रश्नों की तैयारी करें क्योंकि पूरी संभावना है कि आपके इंटरव्यू का 50-70 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमेगा।
  • अगर आपने इन प्रश्नों पर महारत हासिल कर ली तो आप बोर्ड को यह महसूस कराने में सफल हो जाएंगे कि आप अत्यंत गंभीर तथा योग्य उम्मीदवार हैं।
  • अब सवाल यह उठता है कि इन प्रश्नों की तैयारी कैसे करें? इसका सही तरीका है कि प्रश्नों से जुड़ी जानकारियों को 2-3 बिंदुओं के रूप में नोट करते जाएँ। कुछ उम्मीदवार तो पूरे-पूरे उत्तर लिखकर तैयार करते हैं जो दरअसल एक व्यर्थ प्रक्रिया है। वे भूल जाते हैं कि इंटरव्यू के तनाव भरे माहौल में रटे हुए उत्तर देना संभव नहीं होता। वहाँ आपको सिर्फ कुछ बिंदु याद आते हैं जो आपकी अपनी सहज भाषा में ही व्यक्त होते हैं। इसलिये, अपने नोट्स केवल बिंदुओं के रूप में ही बनाएँ ताकि आपका समय व्यर्थ न हो और आप बेझिझक उत्तर दे सकें।
  • यदि 2-4 प्रश्न ऐसे हों जो आपको निरंतर बेचैन करते हों तो उनके उत्तर लिखकर रख लेना गलत नहीं होगा क्योंकि उन उत्तरों से आपका आत्मविश्वास बना रहेगा। वैसे भी, 2-4 याद किये हुए उत्तरों का प्रयोग तो इंटरव्यू के तनावपूर्ण माहौल में भी किया ही जा सकता है।
  • प्रश्नों की सूची बनाने के बारे में दो बातों पर विशेष ध्यान दें। एक तो उस विषय पर यह ज़रूर देख लें कि उसमें आज के समय में क्या नया हो रहा है? उदाहरण के लिये, अगर आपका विषय हिंदी साहित्य है तो आपको हल्का-फुल्का यह भी पता होना चाहिये कि पिछले 5-10 वर्षों में कौन सी प्रसिद्ध रचनाएँ लिखी गई हैं? दूसरे, इस बात पर विशेष ध्यान दें कि किसी विषय का प्रशासन में क्या योगदान हो सकता है? आपका विषय चाहे दर्शनशास्त्र ही क्यों न हो, पूरी संभावना है कि आपसे यह पूछा जाएगा कि दर्शन आपको प्रशासन के क्षेत्र में क्या मदद पहुँचाएगा?

दृष्टिकोण पक्ष:

  • इंटरव्यू की तैयारी में सबसे अधिक समय भले ही ज्ञान या जानकारियों के संग्रहण व स्मरण में खर्च होता हो, पर सच यह है कि जो चीज़ इंटरव्यू में सफलता की दृष्टि से सबसे अधिक असर रखती है, वह है- विभिन्न मुद्दों के प्रति उम्मीदवार का दृष्टिकोण। एक अच्छा इंटरव्यू बोर्ड उम्मीदवार के दृष्टिकोण से ही तय करता है कि वह सिविल सेवाओं में शामिल होने के लिये उपयुक्त है या नहीं?
  • संघ लोक सेवा आयोग सिविल सेवा के उम्मीदवारों से अपेक्षा रखता है कि उनका दृष्टिकोण एकतरफा न होकर संतुलित तथा प्रगतिशील हो। इसलिये, आपको दिन-प्रतिदिन की चर्चाओं में उठने वाले विवादास्पद मुद्दों के दोनों पक्षों को गहराई से देखने का अभ्यास तत्काल शुरू कर देना चाहिये।
  • आपके उत्तरों से यह भाव स्पष्ट होना चाहिये कि आप किसी भी विषय पर निर्णय करने से पहले अपनी तर्क बुद्धि का सही उपयोग करते हैं, किसी के बहकावे या उकसावे में नहीं आते।
  • इसके लिये ज़्यादा से ज़्यादा विवादास्पद मुद्दों पर आपको अभ्यास करते रहने की ज़रूरत है। उदाहरण के लिये- समलैंगिकता उचित है या नहीं, वेश्यावृत्ति को वैधता प्रदान की जानी चाहिये या नहीं, शराबबंदी की नीति उचित है या नहीं आदि। इस तरह के हर उस सवाल के पक्ष-विपक्ष में अपने तर्क सोचकर रखिये जो अख़बारों या सोशल मीडिया के माध्यम से आपके सामने आता है। कुछ अपवाद के मुद्दों को छोड़कर आपका दृष्टिकोण संतुलित और व्यावहारिक होना चाहिये।
  • हो सके तो पक्ष-विपक्ष के सभी तर्कों को नोट कर लेने के बाद एक पैराग्राफ में अपना निष्कर्ष लिखने का अभ्यास भी करें।
  • निष्कर्ष की भाषा सीधी सपाट या एकतरफा न होकर ऐसी होनी चाहिये कि उसमें समस्या की जटिलता, आपकी प्रगतिशीलता तथा संतुलन बनाने की क्षमता ठीक तरीके से अभिव्यक्त हो।

अभिव्यक्ति पक्ष:

  • इंटरव्यू की तैयारी का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष, जिसे अधिकांश उम्मीदवार गौण समझकर छोड़ देते हैं, अभिव्यक्ति क्षमता से जुड़ा है। सरल भाषा में इसका अर्थ है कि उम्मीदवार अपनी बातों को इंटरव्यू बोर्ड के सामने कितनी प्रभावशीलता के साथ प्रस्तुत करता है? उसकी शब्दावली, उच्चारण, उतार-चढ़ाव, शारीरिक अभिव्यक्तियाँ आदि वे पक्ष हैं जो समग्र रूप में उसकी अभिव्यक्ति शैली को परिभाषित करते हैं।
  • पहली बाधा यही है कि इंटरव्यू बोर्ड के सामने उम्मीदवार घबराहट के मारे मौन न हो जाए। अगर आपकी पृष्ठभूमि में ऐसे अनुभव नहीं रहे हैं तो मुख्य परीक्षा के बाद से ही 8-10 मित्रों का समूह बना लीजिये और दैनिक तौर पर उन सभी के सामने किसी अचानक मिले विषय पर 10-15 मिनट निरंतर बोलने की कोशिश कीजिये। एक महीना होते-होते आपके लिये अपनी बात रखना कठिन नहीं रह जाएगा।
  • अगर आप किसी ऐसे क्षेत्र का पर्याप्त अनुभव रखते हैं जिसमें अभिव्यक्ति शैली का विकास अपने आप हो जाता है तो आप प्रायः निश्चिंत रह सकते हैं। उदाहरण के लिये, अगर आपने स्कूल या कॉलेज स्तर पर वाद-विवाद या भाषण प्रतियोगिताओं में खूब भाग लिया है या आपको अध्यापन या वकालत जैसे कार्य का अनुभव है तो पहली बाधा दूर हो जाती है।
  • अपनी बात को मंच पर रखना एक बात है और इंटरव्यू बोर्ड के समक्ष रखना दूसरी बात है। कई बार कुछ अध्यापक और वकील यहीं मार खा जाते हैं। वे अपने व्यवसाय में विद्यार्थी या मुवक्किल के सामने जिस वर्चस्वशाली मनःस्थिति में होते हैं, कई बार उसी मनःस्थिति से इंटरव्यू बोर्ड में पेश आते हैं जो अंततः उनके लिये घातक साबित होता है।
  • इसलिये, बेहतर यही है कि अपनी अभिव्यक्ति को इंटरव्यू के अनुकूल ढाला जाए। इसके लिये उचित समय पर आप 4 मित्रों का समूह बनाएँ और उनमें से 3-3 मित्र मिलकर चौथे मित्र का इंटरव्यू लें। कोशिश यह होनी चाहिये कि आज से इंटरव्यू वाले दिन तक रोज़ कम-से-कम एक मॉक इंटरव्यू का अभ्यास होता रहे।
  • यह ज़रूर ध्यान रखिये कि आप मित्रों द्वारा दी गई हर राय को महत्त्व न दें, केवल उन्हीं सलाहों को स्वीकार करें जिन्हें लेकर उनमें आम राय है और आप खुद भी उनसे सहमत हैं।
  • ऐसे साक्षात्कारों का निरंतर अभ्यास होने के बाद कोई वज़ह नहीं रह जाती कि उम्मीदवार इंटरव्यू बोर्ड में नर्वस हो या खुद को ठीक से व्यक्त न कर पाए।
  • एक उपयोगी सुझाव यह भी है कि इंटरव्यू की तैयारी बंद कमरे में करने की बजाय गंभीर मित्रों के छोटे समूह के साथ करें और अधिक से अधिक मुद्दों पर सामूहिक परिचर्चा करें। इससे बहुत कम समय में किसी विषय के सभी आयाम खुल जाते हैं, साथ में अभिव्यक्ति क्षमता तो मज़बूत होती ही है।

वेशभूषा आदि की तैयारी:

  • इंटरव्यू की तैयारी में सबसे पहला प्रश्न यही आता है कि उम्मीदवार इंटरव्यू में क्या पहने और किस तरह की वेशभूषा से परहेज करे? इसका सामान्य सा नियम यही है कि एक औपचारिक बैठक के लिये व्यक्ति की जैसी वेशभूषा होनी चाहिये, वैसी ही वेशभूषा इंटरव्यू में अपेक्षित होती है।
  • इस पक्ष का अर्थ है कि उम्मीदवार इंटरव्यू में प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी दिखे। उसकी वेशभूषा, हेयर स्टाइल, बैठने और चलने का तरीका आदि इसमें शामिल हैं।

पुरुष उम्मीदवारों की वेशभूषा

  • यूपीएससी के इंटरव्यू में पुरुष उम्मीदवारों की वेशभूषा औपचारिक (Formal) होनी चाहिये। इसके लिये बेहतर होगा कि वे पूरी बाँहों की औपचारिक (Formal) सी दिखने वाली कमीज़ (Shirt) पहनें और वैसी ही औपचारिक (Formal) पैंट या ट्राउज़र्स को प्राथमिकता दें।
  • ध्यान रखें कि वेशभूषा का औपचारिक होना अत्यंत आवश्यक है। उम्मीदवार को किसी भी स्थिति में जींस जैसी अनौपचारिक (Casual) वेशभूषा से बचना चाहिये। आधी बाँह की कमीज़ भी प्रायः अनौपचारिक मानी जाती है, इसलिये बेहतर होगा कि उम्मीदवार इस तरह के किसी भी परिधान को धारण करने से बचें।
  • कुछ उम्मीदवार इंटरव्यू में कोट-पैंट, ब्लेज़र या सूट पहनना पसंद करते हैं। ब्लेज़र का विकल्प काफी अच्छा है क्योंकि उसमें व्यक्ति एकदम अफसर जैसा दिखने लगता है। वहीं सूट में औपचारिकता थोड़ी ज़्यादा होती है। वस्तुतः सर्दी के मौसम में होने वाले साक्षात्कारों में ब्लेज़र, कोट या सूट पहना जा सकता है पर गर्मी के मौसम में ऐसी वेशभूषा को धारण करने से बचना ज़्यादा बेहतर विकल्प होगा।
  • अगर किसी उम्मीदवार को गर्मी के मौसम में ब्लेज़र या सूट पहनने की अधिक इच्छा हो तो उसे इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये तैयार रहना चाहिये कि ‘आपने इतनी गर्मी में सूट क्यों पहना है?’ हालाँकि यह प्रश्न बहुत कठिन नहीं है और इसका आसान सा उत्तर यह हो सकता है कि “सर, यह एक समर कोट है। इसे पहनने से कोट वाली फॉर्मल फीलिंग तो आती है पर इसमें गर्मी की समस्या नहीं है।”
  • जहाँ तक कपड़ों के रंगों का प्रश्न है, इस संबंध में पुरुष उम्मीदवारों के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं होते है। वस्तुतः इंटरव्यू आदि की वेशभूषा का एक बुनियादी सिद्धांत यह है कि कमीज़ और पैंट (ट्राउज़र्स) के रंग कंट्रास्ट हो अर्थात् दोनों का रंग एक-दूसरे के विपरीत हो क्योंकि कंट्रास्ट रंगों को धारण करने से व्यक्तित्व का आकर्षण उभरता है।
  • औपचारिक वेशभूषा के सन्दर्भ में प्रायः यह माना जाता है कि कमीज़ का रंग हल्का होना चाहिये और ट्राउज़र्स का रंग गहरा। हालाँकि इसके विपरीत भी पहनावा रखा जा सकता है, (अर्थात् गहरे रंग की कमीज़ के साथ हल्के रंग की ट्राउज़र्स) परंतु वह अधिक प्रचलित विकल्प नहीं है।
  • आमतौर पर आसमानी, हल्की सलेटी (ग्रे), बादामी (क्रीम) या सफेद रंग की कमीज़ इंटरव्यू के लिये पहनी जाती हैं। जहाँ तक पैंट का प्रश्न है, वह कमीज़ के रंग के कंट्रास्ट में होनी चाहिये। उदाहरण के लिये, अगर आसमानी रंग की कमीज़ है तो गहरे नीले रंग की ट्राउज़र्स बेहतर होगी।
  • पुरुष उम्मीदवारों को चाहिये कि वे कमीज़ के साथ टाई भी पहनें। हिंदी माध्यम तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि से परीक्षा देने वाले कई उम्मीदवारों की समस्या यह होती है कि आदत न होने के कारण वे टाई पहनने के नाम से ही असहज होने लगते हैं। पर इस संबंध में यह समझना ज़रूरी है कि इंटरव्यू बोर्ड उम्मीदवार से एक भावी अधिकारी वाले तेवर की उम्मीद करता है। टाई लगाते ही उम्मीदवार का व्यक्तित्व न सिर्फ औपचारिक (Formal) हो जाता है बल्कि उसमें आकर्षण भी बढ़ जाता है।
  • अगर कोई उम्मीदवार इस तर्क के आधार पर टाई नहीं लगाता है कि वह इसमें सहज नहीं है तो ध्यान रखें कि यह कोई प्रभावकारी तर्क नहीं है। क्योंकि इस संबंध में इंटरव्यू बोर्ड उम्मीदवार से यह प्रश्न कर सकता है कि अगर आप एक टाई के साथ भी सहज नहीं हो पा रहे हैं तो हम आपसे यह उम्मीद कैसे करें कि आईएएस बनने के बाद आप रोज़-रोज़ नई चुनौतियों का सामना सहजता से कर पाएंगे?
  • जहाँ तक किसी राज्य लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू का प्रश्न है, वहाँ टाई के बिना इंटरव्यू देना प्रायः गलत नहीं माना जाता है, हालाँकि वहाँ भी बेहतर यही रहेगा कि उम्मीदवार टाई लगाए। रही बात संघ लोक सेवा आयोग की- तो यहाँ टाई नहीं लगाने पर उम्मीदवार के बारे में बोर्ड की राय नकारात्मक हो जाने की पर्याप्त संभावना रहती है।
  • टाई चुनते समय कोशिश करनी चाहिये कि उसका रंग कमीज़ के रंग के कंट्रास्ट में हो किंतु वह ट्राउज़र्स के रंग से मिलती-जुलती भी न हो। उदाहरण के लिये, अगर उम्मीदवार आसमानी रंग की कमीज़ और गहरे नीले रंग की ट्राउज़र्स पहनता है तो टाई का रंग गाढ़ा मैरून, जिस पर गहरे नीले रंग की तिरछी रेखाएँ हों, बेहतर रहेगा। अगर सफेद रंग की कमीज़ और डार्क ग्रे रंग की ट्राउज़र्स हैं तो गहरे नीले या गहरे मैरून रंग की टाई जँचेगी। सिर्फ एक रंग की यानी प्लेन टाई बुरी तो नहीं लगती, पर उसका प्रभाव बहुत अच्छा नहीं पड़ता। बेहतर होगा कि टाई में एक बेस रंग हो तथा एक अन्य रंग का डिज़ाइन अवश्य हो।
  • किसी गहरे रंग के बेस पर किसी दूसरे रंग की तिरछी रेखाओं वाली टाई इंटरव्यू जैसी औपचारिक स्थिति के लिए बेहतर मानी जाती है। तिरछी रेखाओं का डिज़ाइन पसंद न आए तो कोई दूसरा डिज़ाइन (जैसे छोटे आकार का चैक प्रिंट) भी लिया जा सकता है, किंतु यह ज़रूरी है कि वह डिज़ाइन व्यवस्थित प्रकार का हो, न कि बिखरा हुआ और अव्यवस्थित।
  • पुरुष उम्मीदवारों की वेशभूषा में तीसरा पक्ष जूतों का होता है। इस संबंध में ज़्यादा विकल्प नहीं हैं। यह लगभग अनिवार्य माना जाता है कि उम्मीदवार काले रंग के चमड़े के जूते पहने। यहाँ इस बात पर विशेष गौर करने की आवश्कता है कि जूते फैंसी किस्म के नहीं होने चाहिये बल्कि साधारण होने चाहिये। फीते बांधने वाले परंपरागत किस्म के जूतों को ही औपचारिक वेशभूषा का हिस्सा माना जाता है।
  • जूतों को अच्छे तरीके से पॉलिश करना न भूलें। उनके साथ किसी एक ही रंग के मोजे पहनें, रंग-बिरंगे नहीं। आमतौर पर सफेद, काले या ग्रे रंग के मोजे इंटरव्यू जैसे औपचारिक मौकों के लिये उचित माने जाते हैं।
  • जूतों को वेशभूषा का गौण पक्ष न समझें। यह सही है कि आमतौर पर इंटरव्यू देते समय बोर्ड के सदस्यों की निगाह उम्मीदवार के जूतों पर नहीं जाती, किंतु यह भी उतना ही सही है कि कुछ इंटरव्यू विशेषज्ञ जूतों पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं। ऐसे लोगों की राय में व्यक्ति के व्यक्तित्व की काफी हद तक पहचान इसी बात से हो जाती है कि वह अपने जूतों के रख-रखाव को लेकर कितना सचेत है।

महिला उम्मीदवारों की वेशभूषा

  • महिला उम्मीदवारों को सबसे पहले तय कर लेना चाहिये कि वे साड़ी पहनने को वरीयता देंगी या सूट को? हालाँकि बेहतर यही रहेगा कि वे साड़ी पहनने का विकल्प चुनें। यह तर्क देना एकदम गलत होगा कि मुझे साड़ी पहनने का अभ्यास नहीं है। ऐसी सफाई पर इंटरव्यू बोर्ड की वही प्रतिक्रिया होगी जो किसी पुरुष उम्मीदवार के यह कहने पर होती है कि उसे टाई पहनने का अभ्यास नहीं है।
  • अगर कोई महिला उम्मीदवार किसी राज्य लोक सेवा आयोग का इंटरव्यू दे रही है तो वह एक बार सूट के विकल्प पर विचार कर सकती है, हालाँकि वहाँ भी बेहतर यही रहेगा कि वह साड़ी पहने।
  • संघ लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू में तो यह अपेक्षा की ही जाती है कि महिला उम्मीदवार साड़ी जैसी औपचारिक वेशभूषा में ही उपस्थित हों। इसके बाद भी अगर कोई महिला उम्मीदवार सूट के विकल्प को ही चुने तो उसे इतना ध्यान रखना चाहिये कि सूट का रंग और डिज़ाइन औपचारिक या फॉर्मल हो। फैंसी किस्म का सूट पहनकर किसी भी स्थिति में इंटरव्यू देने न जाएँ।
  • अगर कोई महिला उम्मीदवार कमीज़ और ट्राउज़र्स पहनकर इंटरव्यू देना चाहे तो यह विकल्प भी बुरा नहीं है। किसी प्रदेश लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू में यह प्रयोग शायद अटपटा सा लगे, किंतु संघ लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू में ऐसा प्रयोग किया जा सकता है। फिर भी, अगर साड़ी और अन्य विकल्पों की तुलना करनी हो तो इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों पर सकारात्मक प्रभाव डालने की दृष्टि से साड़ी का विकल्प अधिक बेहतर रहेगा।
  • जहाँ तक साड़ी के रंग और डिज़ाइन का प्रश्न है, तो इस संबंध में सामान्य नियम सिर्फ इतना है कि वेशभूषा औपचारिक बनी रहे। साड़ी का रंग चटकीला न हो, उसमें ज़्यादा रंगों की उपस्थिति न हो।
  • आमतौर पर, साड़ी का रंग गहरा नीला, गहरा हरा, हल्का गुलाबी, बादामी, मैरुन या काला होना चाहिये और उसमें कंट्रास्ट करता हुआ एक पतला सा बोर्डर होना चाहिये। इसके अलावा, साड़ी के बीच-बीच में कोई व्यवस्थित सा डिज़ाइन (जैसे कहीं-कहीं कुछ रेखाएँ, चैक या कोई प्रतीकात्मक आकृति) रहे तो बेहतर दिखेगा, पर यह डिज़ाइन बहुत भारी या लाउड किस्म का नहीं होना चाहिये।
  • अगर उम्मीदवार का शारीरिक गठन कमज़ोर है तो उसे सूती यानी कॉटन की साड़ी पहननी चाहिये और अगर शारीरिक गठन कुछ भारी है तो रेशम यानी सिल्क की साड़ी बेहतर होगी। इसका कारण यह है कि जहाँ कॉटन के कपड़े कुछ फूले हुए से नज़र आते हैं, वहीं सिल्क के कपड़े अतिरिक्त स्थान नहीं घेरते। जिन उम्मीदवारों का दैहिक गठन सामान्य है, वे अपनी रुचि से कोई भी विकल्प चुन सकती हैं।
  • अगर इंटरव्यू ठंडे मौसम में हो रहा है तो बेहतर होगा कि महिला उम्मीदवार साड़ी पर ब्लेज़र भी पहनें। ब्लेज़र पहनने से व्यक्तित्व एकदम अफसरों जैसा लगने लगता है। ब्लेज़र साड़ी के रंग से कंट्रास्ट में होना चाहिये। आमतौर पर काला या नेवी ब्लू ब्लेज़र ही उपयुक्त रहता है।
  • सामान्यतः महिला उम्मीदवारों से अपेक्षा की जाती है कि वे फॉर्मल से नज़र आने वाले सैंडल पहनें जिनमें कोई फैंसी टच न हो। बेहतर होगा कि सैंडल काले, भूरे या क्रीम रंग के हों। अगर वे चाहें तो साड़ी या शर्ट-पैंट के साथ फॉर्मल जूते भी पहन सकती हैं, पर उनके जूते फीते वाले नहीं, खुले हों तो अच्छा रहेगा।
  • इंटरव्यू में किसी भी तरह का पर्स लेकर नहीं जाना चाहिये। अगर रुमाल जैसी एकाध चीज़ साथ ले जाना ज़रूरी लगे तो उसे हाथ में ही ले जाएँ। बेहतर यही होगा कि उससे भी परहेज़ करें।

महिला तथा पुरुष दोनों उम्मीदवारों की वेशभूषा से जुड़े कुछ अन्य सुझाव:

  • अगर उम्मीदवार ने अपने हाथों में कोई अंगूठी इत्यादि पहन रखी है तो इस पर कुछ गंभीर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अगर अंगूठी का संबंध सगाई या शादी से है तो कोई समस्या नहीं है, किंतु अगर उसके पीछे ज्योतिष या नक्षत्र विज्ञान जैसा कोई आधार है तो समस्या हो सकती है।
  • इस समस्या से बचने के लिये उम्मीदवार के पास दो ही विकल्प हैं- या तो वह ऐसी चीज़ें पहनकर न जाए, या फिर उनसे संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने के लिये तैयार रहे।
  • इंटरव्यू में उम्मीदवार का हेयर स्टाइल भी मायने रखता है। जहाँ तक पुरुष उम्मीदवारों का सवाल है, उनसे इतनी ही अपेक्षा है कि उनके बाल छोटे व व्यवस्थित हों। बहुत लंबे बाल रखने वाले व्यक्तियों को प्रायः प्रशासनिक सेवाओं के संदर्भ में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता।
  • महिला उम्मीदवारों के पास दोनों विकल्प हैं। वे लंबे बाल भी रख सकती हैं और छोटे भी, पर दोनों ही स्थितियों में हेयर स्टाइल व्यवस्थित तथा औपचारिक होना चाहिये। अगर लंबे बाल हों तो खुले बालों के साथ इंटरव्यू देना अच्छा नहीं माना जाता।
  • कुछ उम्मीदवारों के लिये, जिनकी आयु अमूमन 30 वर्ष से ज़्यादा होती है, उनके लिये एक और सुझाव है। अगर उनके कुछ बाल सफेद हो गए हैं और वे नज़र आते हैं तो बेहतर होगा कि इंटरव्यू से पहले वे उन पर हेयर कलर या मेहंदी जैसा कुछ उपाय कर लें।
  • अगर उम्मीदवार बूढ़ा दिखता है तो स्वाभाविक तौर पर बोर्ड के सदस्यों के मन में उसके प्रति अच्छा भाव उत्पन्न नहीं होगा। जिसका कारण यह है कि किसी वृद्ध उम्मीदवार को चयनित करने की अपेक्षा बोर्ड द्वारा किसी नए उम्मीदवार को चयनित करने पर अधिक बल दिया जाता हैं।
  • अगर उम्मीदवार नज़र का चश्मा लगाते हैं, उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि चश्मा उनके चेहरे का सौंदर्य बढ़ाता हो, न कि उस पर हावी होता हो। आमतौर पर बहुत बड़े फ्रेम के चश्मे चेहरे को ढक देते हैं जिनसे बचना चाहिये।
  • अगर आप चश्मा नहीं पहनते हैं और आपकी आँखें कुछ धँसी हुई सी हैं या उनके नीचे काले घेरे बने हुए हैं तो इंटरव्यू में उन्हें छिपाने के लिये ज़ीरो नंबर का रिमलैस फ्रेम पहन लेना उचित होगा।
  • इस पक्ष को समझने तथा अपने व्यक्तित्व को इंटरव्यू के अनुकूल बनाने में बहुत अधिक समय और ऊर्जा व्यय करने की आवश्यकता नहीं होती, अतः इसे मुख्य परीक्षा के परिणाम के बाद के समय के लिये छोड़ देना बेहतर होता है।

इंटरव्यू से जुड़े अन्य पहलू 

इंटरव्यू बोर्ड की संरचना:

  • इंटरव्यू से पूर्व उम्मीदवार को यह जानना ज़रूरी है कि इंटरव्यू बोर्ड में कितने सदस्य होते हैं और उनकी क्या भूमिका होती है?
  • संघ लोक सेवा आयोग की सामान्य नीति है कि इंटरव्यू बोर्ड में पाँच सदस्य होने चाहिये। अगर कोई उम्मीदवार किसी भारतीय भाषा (हिंदी या किसी अन्य भाषा) के माध्यम से इंटरव्यू देता है तो उसके बोर्ड में पाँच सदस्यों के अलावा एक व्यक्ति (दुभाषिया या इंटरप्रेटर) भी उपस्थित होता है जिसका कार्य अनुवाद संबंधी समस्याओं को सुलझाना होता है।
  • प्रत्येक बोर्ड में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं । अध्यक्ष के तौर पर वही व्यक्ति हो सकता है जो संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य हों।
  • इंटरव्यू बोर्ड में अध्यक्ष के अलावा जो चार सदस्य होते हैं, उनमें से प्रायः दो से तीन नौकरशाही के ही ऊँचे स्तर के अधिकारी होते हैं। आमतौर पर संयुक्त सचिव या उससे वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों को इस भूमिका के लिये  आमंत्रित किया जाता है।
  • बोर्ड में कम से कम एक सदस्य अकादमिक जगत से संबंधित होता है। इस कार्य के लिये प्रायः किसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति या प्रोफेसर स्तर के व्यक्ति को आमंत्रित किया जाता है।
  • आयोग की कोशिश रहती है कि इंटरव्यू लेने वाले पाँच सदस्यों में कम से कम एक महिला सदस्य अवश्य शामिल हो, हालाँकि यह कोई लौह-नियम नहीं है। तथापि उम्मीदवार को इस बात के लिये तैयार रहना चाहिये कि बोर्ड में कम से कम एक महिला सदस्य भी उपस्थित होगी।

इंटरव्यू कक्ष में प्रवेश कैसे करें?

  • उम्मीदवारों का इंटरव्यू आयोग के एक बंद कमरे में इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों के समक्ष होता हैं। कुछ कमरे ऐसे हैं जिनमें प्रवेश करते ही सामने आपको बोर्ड के सभी सदस्य बैठे हुए नज़र आते हैं जबकि कुछ कमरे काफी बड़े आकार के हैं जिनमें कुछ कदम चलने के बाद मुड़ने पर बोर्ड के सदस्य दिखाई पड़ते हैं।
  • जैसे ही आपको बुलाए जाने के लिये घंटी बजेगी, आयोग का कर्मचारी स्वयं ही आपके लिये दरवाज़ा खोल देगा। जैसे ही आपके लिये दरवाज़ा खोला जाएगा, वहीं से आपकी परीक्षा शुरू हो जाएगी।
  • इंटरव्यू की पहली चुनौती यह है कि बोर्ड के सदस्यों का अभिवादन कैसे किया जाए? अभिवादन ठीक उस बिंदु पर किया जाना चाहिये जहाँ से पहली बार बोर्ड सदस्यों के साथ आपकी नज़रें मिलती हैं। अगर दरवाज़ा खुलते ही वे लोग सामने बैठे हुए दिखें तो आपको प्रवेश करने के साथ ही अभिवादन करना चाहिये। यदि थोड़ा चलकर मुड़ने के बाद वे आपको नज़र आएँ तो मोड़ पर पहुँचकर (यानी उनके सामने पहुँचकर) आपको अभिवादन करना चाहिये।
  • अगर आपको लगे कि बोर्ड के अध्यक्ष का ध्यान आपकी ओर नहीं है या सभी सदस्य आपस में बातचीत में मशगूल हैं तो सबसे पहले आपको पूछना चाहिये कि “क्या मैं आ सकता हूँ, सर/मैडम” ? यह वाक्य हिंदी में ही बोला जाए, ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। अगर आप अंग्रेज़ी में सहज हैं तो ‘मे आई कम इन, सर/मैडम’ भी कह सकते हैं। आमतौर पर बोर्ड के सदस्य बहुत सुलझे हुए होते हैं और ऐसी छोटी-मोटी बातों को तवज्जो नहीं देते।
  • जैसे ही आप भीतर आने की अनुमति मांगेंगे, वैसे ही अध्यक्ष या कोई न कोई सदस्य आपको अनुमति दे देंगे। अनुमति मिलते ही आपको अभिवादन करना चाहिये। अभिवादन के लिये ‘नमस्कार’, ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड आफ्टरनून’ में से कुछ भी बोल सकते हैं, परन्तु यहाँ किसी भी प्रकार की नाटकीयता से बचना चाहिये।
  • सभी सदस्यों को बारी-बारी नमस्कार करने की बजाए सिर्फ एक बार अध्यक्ष की तरफ हल्का सा सिर झुकाकर नमस्कार कर देना काफी होता है। नमस्कार के लिए हाथ न जोड़ें क्योंकि उससे अति औपचारिकता या चापलूसी का भाव नज़र आता है। अगर आपने ठाना हुआ है कि सभी सदस्यों को नमस्कार करना ही है तो ज़्यादा से ज़्यादा दो बार नमस्कार कह दें- एक बार बाईं ओर के सदस्यों को देखते हुए और एक बार दाईं ओर के सदस्यों को देखते हुए।
  • कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जाता हैं कि अगर बोर्ड में कोई महिला सदस्य उपस्थित हो तो उन्हें अलग से अभिवादन किया जाना चाहिये। यह बात गलत नहीं है पर इसे बहुत ज़्यादा महत्त्व नहीं देना चाहिये। सहजता से ऐसा कर पाएँ तो ठीक है, पर भूल जाएँ तो तनाव न लें। इसका बोर्ड के सदस्यों पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।
  • ऐसा भी हो सकता है कि जैसे ही आप बोर्ड के समक्ष पहुँचें, आपके अनुमति मांगने से पहले ही वे आपसे भीतर आने के लिए कह दें। ऐसा हो तो घबराएँ नहीं। वे किसी साजिश के तहत ऐसा नहीं करते हैं, वरन् सामान्य भाव से करते हैं। ऐसी स्थिति में आपको बातचीत की शुरुआत अभिवादन से करनी चाहिये।
  • जैसे ही आप अभिवादन करेंगे, वे आपको जवाब देने के बाद बैठने के लिये कहेंगे। ऐसा होते ही आपको ‘धन्यवाद सर/मैडम’ कहकर बैठ जाना चाहिये। ‘सर’ और ‘मैडम’ में से किस संबोधन का प्रयोग करना है, इसका फैसला अध्यक्ष के अनुसार या उस सदस्य के अनुसार करना चाहिये जिसने आपसे बैठने के लिये कहा है।
  • कभी-कभी ऐसा होता है कि बोर्ड सदस्य आपके अभिवादन का जवाब देने के बाद भी आपको बैठने के लिये न कहें। अगर ऐसा हो तो भी आप घबराएँ नहीं। मानकर चलें कि यह भी किसी साजिश के तहत नहीं बल्कि भूलवश हुआ होगा। कुछ देर शांति से वहीं खड़े रहें। बोर्ड के सदस्य आपको खड़ा हुआ देखकर खुद ही बैठने को कह देंगे। अगर उनका ध्यान आपकी ओर न जाए तो आपको स्वयं उनसे पुनः निवेदन कर लेना चाहिये।

बैठने का सही तरीका:

  • इंटरव्यू कक्ष में प्रवेश करते ही बोर्ड के सदस्य उम्मीदवार से बैठने का निवेदन करते हैं। उनकी मेज़ के सामने उम्मीदवार के लिये एक कुर्सी रखी होती है। कई उम्मीदवार सोचते हैं कि उन्हें कुर्सी को आगे-पीछे नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर अवांछनीय शोर होता है। इस भय के कारण वे कुर्सी पर बैठ तो जाते हैं किंतु सहज नहीं हो पाते।
  • इस संबंध में ध्यान रखने की बात यह है कि अगर उम्मीदवार सहज होकर बैठेगा ही नहीं तो वह अगले आधे घंटे तक ठीक से बात कैसे करेगा? उसके मन में कहीं न कहीं यह तनाव बना रहेगा कि वह सुविधाजनक तरीके से नहीं बैठा है। इसी तनाव में उसका निष्पादन कमज़ोर हो जाएगा और कुल मिलाकर एक छोटे से भय के कारण उसकी संभावित सफलता भी खतरे में पड़ जाएगी।
  • इसका समाधान यह है कि बैठते समय अपनी सहजता को सर्वाधिक महत्त्व दें। अगर आपकी कुर्सी सदस्यों की मेज़ से बहुत दूर या अत्यंत नज़दीक रखी है तो उसे आगे या पीछे करने में बिल्कुल भी संकोच न करें। कोशिश करनी चाहिये कि यह प्रक्रिया दो-तीन सेकण्ड से ज़्यादा लंबी न हो।

इंटरव्यू की शुरुआत

  • इंटरव्यू की शुरुआत बोर्ड अध्यक्ष द्वारा की जाती है। सामान्य परंपरा यह है कि अध्यक्ष महोदय उम्मीदवार का परिचय शेष सदस्यों से करवाते हैं। वह उसके बायोडाटा की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें पढ़कर सुनाते हैं ताकि शेष सदस्य यह तय कर सकें कि वे उम्मीदवार से किस संदर्भ में प्रश्न पूछेंगे।
  • यहाँ यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सभी सदस्यों के पास उम्मीदवार द्वारा मुख्य परीक्षा के फॉर्म में दी गई जानकारियों का संक्षिप्त रिकॉर्ड होता है और वे उसके आधार पर उससे कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं।
  • अध्यक्ष महोदय शुरुआत में आमतौर पर बायोडाटा से जुड़े बुनियादी प्रश्न पूछते हैं। उनका पहला दायित्व यही होता है कि वे उम्मीदवार का तनाव कम करके उसे सहज स्थिति में ले आएँ। उम्मीदवार को विशेष रूप से कोशिश करनी चाहिये कि वह बोर्ड अध्यक्ष के प्रश्नों का जवाब उत्कृष्टता के साथ दे।
  • अपनी बात पूरी कर लेने के बाद बोर्ड अध्यक्ष अपने निकट बैठे सदस्य से निवेदन करते हैं कि वे उम्मीदवार से प्रश्न पूछें।
  • आपका इंटरव्यू कितना देर चलेगा इसका संबंध इस बात से है कि आप माहौल को कितना रोचक बना पा रहे हैं? यह ज़रूरी तो नहीं है लेकिन आमतौर पर इंटरव्यू लंबा चलने और अधिक अंक आने में सहसंबंध देखा जाता है।

इंटरव्यू के दौरान होने वाली सामान्य बातें:

  • यहाँ हमें एक सवाल पर विचार करना चाहिये जिसे लेकर बहुत से उम्मीदवार संशय में रहते हैं। प्रश्न यह है कि जिस समय कोई सदस्य उम्मीदवार से बातचीत कर रहा होता है, उस समय उम्मीदवार को सिर्फ उसी से बातचीत करनी चाहिये या बोर्ड के बाकी सदस्यों को भी बातचीत में शामिल करना चाहिये?
  • कुछ लोगों के अनुसार, उम्मीदवार को सभी बोर्ड सदस्यों से बातचीत करनी चाहिये। इसके लिये उसे जवाब देते समय शेष सदस्यों को भी देखते रहना चाहिये ताकि वे उसके इंटरव्यू में इन्वॉल्व (Involve) हो सकें। कुछ विशेषज्ञ इस शैली को ‘साइमल्टेनियस आई कॉन्टेक्ट’ (Simultaneous Eye Contact) कहते हैं। उनका तर्क है कि अगर उम्मीदवार किसी एक सदस्य से ही बातचीत करता रहेगा तो बाकी सदस्य उसके इंटरव्यू में इन्वॉल्व नहीं होंगे और अंकों के स्तर पर उसे इसका नुकसान झेलना पड़ेगा।
  • सच कहें तो यह एक भ्रांति है। सही बात यह है कि उम्मीदवार को सिर्फ और सिर्फ उसी सदस्य से बात करनी चाहिये जिसने उससे प्रश्न पूछा है। इस सलाह के पीछे दो कारण हैं।
  • पहला यह कि जब उम्मीदवार किसी सदस्य से बातचीत करते हुए बीच-बीच में दाएँ-बाएँ देखता है तो उस सदस्य को अपना अपमान महसूस होता है। साथ ही उसे यह भी लग सकता है कि उम्मीदवार में आत्मविश्वास या सहजता की कमी है।
  • दूसरा यह है कि बाकी सदस्य भी उम्मीदवार के ऐसे प्रयासों से खुश होने की बजाय नाराज़ हो सकते हैं। जब उम्मीदवार किसी विशेष सदस्य से बात कर रहा होता है तो शेष सदस्य निश्चिंत होकर उसे देखते हैं और उसके जवाबों का मूल्यांकन करते हैं। कभी-कभी वे आपस में बातचीत भी करते हैं और ज़रूरत होने पर अपना कोई व्यक्तिगत कार्य भी (जैसे फोन पर मैसेज पढ़ना, चाय पीना इत्यादि) करते हैं। अगर इस समय उम्मीदवार उनकी ओर देखने लगता है तो वे दबाव में आ जाते हैं। उन्हें इंटरव्यू की गरिमा बनाए रखने के लिए सजग होकर उम्मीदवार की ओर देखते रहना पड़ता है और उनकी सहजता खत्म हो जाती है। सहजता खत्म होने से उनका तनाव बढ़ता है और उम्मीदवार के प्रति नाराज़गी का भाव पैदा होता है। इसलिये बेहतर यही है कि उम्मीदवार उनकी सहजता में दखल न दे और सिर्फ उसी सदस्य की ओर मुखातिब रहे जो उससे प्रश्न पूछ रहा है।
  • कभी-कभी ऐसा होता है कि जब उम्मीदवार किसी सदस्य के प्रश्न का उत्तर दे रहा होता है, तभी कोई दूसरा सदस्य या अध्यक्ष स्वयं उम्मीदवार को टोक देता है। यह भी हो सकता है कि एक सदस्य प्रश्न पूछे और दूसरा सदस्य उस प्रश्न से जुड़ी एक बात और पूछ ले। यहाँ प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में उम्मीदवार को क्या करना चाहिये?
  • ऐसी स्थिति को संभालना चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन कुछ सामान्य सिद्धांतों के आधार पर इसे सुलझाया जा सकता है। पहली बात यह है कि अगर बोर्ड का अध्यक्ष बीच में दखल दे तो उम्मीदवार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी उसी के प्रति बनती है। उसे पहले बोर्ड अध्यक्ष के प्रश्न का उत्तर देना चाहिये और फिर वापस उस सदस्य की ओर लौटना चाहिये जिसने मूल प्रश्न पूछा था।
  • वैसे, बोर्ड के अध्यक्ष आमतौर पर खुद ही इस बात का ध्यान रखते हैं। अगर उन्होंने किसी सदस्य के प्रश्न में कोई प्रश्न अपनी ओर से जोड़ा है या उम्मीदवार के उत्तर पर कोई प्रतिप्रश्न किया है तो उम्मीदवार द्वारा उत्तर शुरू करते ही वे खुद इशारा कर देते हैं कि आप इन सदस्य को ही जवाब दें। ऐसा निर्देश मिलने पर उक्त स्थिति उम्मीदवार के लिये अधिक सहज हो जाती है।
  • दूसरा सिद्धांत यह है कि अगर एक सदस्य से बात करते हुए किसी दूसरे सदस्य ने टोका है तो टोकने वाले सदस्य की बात को उसी की ओर देखते हुए ध्यान से सुना जाना चाहिये। किंतु, उत्तर देते समय उम्मीदवार को पहले उसी सदस्य को संतुष्ट करना चाहिये जिसने प्रश्न की शुरुआत की थी क्योंकि ऐसा न होने पर उस सदस्य को अपना अपमान महसूस हो सकता है।
  • अगर टोकने वाले सदस्य का प्रश्न काफी लंबा हो या उसे देखकर ऐसा लगे कि वह उम्मीदवार से अपेक्षा कर रहा है कि वह उसे ही संबोधित करते हुए उत्तर दे तो उम्मीदवार को चाहिये कि उससे विनम्रतापूर्वक अनुमति मांगकर मूल प्रश्न पूछने वाले सदस्य की ओर मुखातिब हो जाए।

इंटरव्यू कक्ष से बाहर निकलना:

  • आमतौर पर, सभी सदस्यों द्वारा प्रश्न पूछे जाने के बाद बोर्ड अध्यक्ष पुनः 2-3 प्रश्न पूछते हैं और उसके बाद इंटरव्यू के समापन की घोषणा करते हैं।
  • चूँकि यह इंटरव्यू बोर्ड के साथ संवाद की अंतिम कड़ी है, इसलिये कोशिश करनी चाहिये कि इस बिंदु पर कोई चूक न हो।
  • ध्यान रखें कि इंटरव्यू के शुरुआती मिनटों में हुई गलतियाँ विशेष नुकसान नहीं करतीं क्योंकि मूल्यांकन के समय तक सदस्य उन्हें भूल चुके होते हैं, किंतु इंटरव्यू के अंत में होने वाली गलतियाँ अक्षम्य मानी जाती हैं क्योंकि ठीक उसी समय इंटरव्यू का मूल्यांकन किया जाता है और वे गलतियाँ सदस्यों को याद रहती हैं।
  • जैसे ही बोर्ड अध्यक्ष जाने के लिये कहें, वैसे ही उम्मीदवार को सभी सदस्यों को धन्यवाद कहना चाहिये।
  • सभी को अलग-अलग धन्यवाद कहना अत्यंत कृत्रिम होता है, इसलिये एक ही अभिव्यक्ति में सभी सदस्यों को धन्यवाद कहना चाहिये। इसके लिये “आप सभी का धन्यवाद सर” या “थैंक्स टू ऑल ऑफ यू सर” कहते हुए गर्दन विनम्रता के साथ थोड़ी बहुत झुका लें तो बेहतर होगा।
  • इसके बाद कुर्सी से उठकर उसे वापस उसी स्थिति में रख देना चाहिये जैसी वह उम्मीदवार को मिली थी।
  • इसके बाद की प्रक्रिया पर अलग-अलग विशेषज्ञों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि इसके बाद उम्मीदवार को सीधे इंटरव्यू कक्ष से बाहर निकल जाना चाहिये जबकि कुछ के अनुसार उसे इंटरव्यू कक्ष से बाहर निकलते समय पुनः एक बार बोर्ड के सदस्यों का अभिवादन करना चाहिये।
  • इस बिंदु पर किये जाने वाले अभिवादन की भाषा “गुड डे सर” या “धन्यवाद सर” हो सकती है।
  • यह अभिवादन ठीक उस स्थान से किया जाना चाहिये जिसके बाद उम्मीदवार को बोर्ड के सदस्य दिखने बंद हो जाए।
  • कोशिश करनी चाहिये कि उम्मीदवार कुर्सी से उठकर इंटरव्यू कक्ष के दरवाज़े तक इस तरह चले कि बोर्ड सदस्यों को उसकी पीठ नज़र न आए।
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