Blog | Kautilya

NRC से बहिष्करण

NRC से बहिष्करण

   Kautilya Academy    19-09-2019

NRC से बहिष्करण

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इसमें हाल ही में जारी की गई राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम सूची तथा संबद्ध मुद्दों पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ
कुछ समय पूर्व असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens-NRC) की अंतिम सूची जारी की गई जिसमें 19 लाख से अधिक आवेदकों के नाम शामिल नहीं किये गए हैं। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का अंतिम मसौदा वर्ष 2018 में जारी किया गया था। जिसमें 40 लाख लोगों NRC की सूची से बाहर कर दिया गया था।

पृष्ठभूमि
असम में शरणार्थियों का मुद्दा राज्य की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रहा है। वर्ष 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी ज़मीन असम में थी और लोगों का दोनों ओर से आना-जाना बँटवारे के बाद भी जारी रहा। इसके चलते वर्ष 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया था। वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा जिसके चलते राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (All Assam Students Union-AASU) ने अवैध तरीके से असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिये एक आंदोलन शुरू किया। AASU के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे।

असम समझौता
15 अगस्त, 1985 को AASU और दूसरे संगठनों तथा भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार, 25 मार्च, 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले हिंदू- मुसलमानों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर किया जाना था। इस समझौते के तहत वर्ष 1961 से वर्ष 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिये गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। इसके अंतर्गत असम के आर्थिक विकास के लिये विशेष पैकेज भी दिया गया। साथ ही यह फैसला भी किया गया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिये विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जाएंगे। असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया।

NRC को अपडेट करने का फैसला
वर्ष 2005 में सरकार ने 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने का फैसला किया और तय किया कि असम समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 से पहले असम में अवैध तरीके से प्रवेश करने वाले लोगों का नाम भी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़नशिप में जोड़ा जाएगा। लेकिन यह विवाद सुलझने की बजाय और अधिक बढ़ता गया तथा मामला कोर्ट पहुँच गया। इसके बाद वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर असम में नागरिकों के सत्यापन का कार्य शुरू किया गया। इसके लिये पूरे राज्य में कई NRC केंद्र खोले गए। नागरिकों के सत्यापन के लिये यह अनिवार्य किया गया कि केवल उन्हीं लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा जिनके पूर्वजों के नाम 1951 के NRC में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद हों।

"अपडेटेड" NRC क्या है?
असम दशकों से बांग्लादेश (पूर्व में पूर्वी बंगाल और फिर पूर्वी पाकिस्तान) से होने वाले प्रवास का साक्षी रहा है, यहाँ पहले से ही एक NRC है, जो वर्ष 1951 में उस वर्ष की जनगणना के आधार पर प्रकाशित की गई थी। इस तरह के दस्तावेज़ वाला यह देश का एकमात्र राज्य है, वर्तमान में असम अपने नागरिकों की पहचान करने के लिये NRC को अपडेट कर रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आज्ञापित एवं निरीक्षित यह अपडेटेड NRC वर्ष 1985 के असम समझौते की असफलता का परिणाम है, जो 24 मार्च, 1971 को नागरिकता के निर्धारण की अंतिम तिथि तय करता है। इस तारीख से पहले असम में प्रवेश करने वाले लोगों को असम के नागरिक के रूप में मान्यता दी जाती है।
क्या पिछले साल जारी की गई NRC अपडेटेड नहीं थी?
यह एक मसौदा था, जो जुलाई 2018 में प्रकाशित हुआ था। उस सूची में भारतीय नागरिकों के रूप में 2.89 करोड़ निवासियों को शामिल किया गया था, जबकि 40 लाख लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया था।
सूची से बाहर किये गए लोगों को पुनः सूची में शामिल करने के लिये आवेदन दायर करने की अनुमति दी गई थी। इस बीच नागरिकों के पास यह विकल्प भी मौजूद था कि यदि उन्हें लगता है कि किसी व्यक्ति को सूची में गलत तरीके से शामिल किया गया है तो वे उसके खिलाफ आपत्ति दर्ज कर सकते थे।
इस वर्ष की शुरुआत में NRC अधिकारियों ने 1 लाख व्यक्तियों के साथ एक अतिरिक्त बहिष्करण सूची तैयार की, जिन्हें मूल रूप से NRC मसौदे में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें योग्य (Eligible) पाया गया।
क्या NRC से बाहर किये गए लोग अवैध प्रवासी हैं?
ज़रूरी नहीं है कि ये सभी अवैध प्रवासी ही हों। अभी भी इनके पास अपील करने का विकल्प मौजूद है। ये लोग एक समय-सीमा के भीतर NRC से अस्वीकृति आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ एक विदेशी ट्रिब्यूनल में अपील के लिये संपर्क कर सकते हैं।
100 मौजूदा विदेशी न्यायाधिकरणों के अलावा और 200 न्यायाधिकरणों को जल्द ही कार्यात्मक बनाया जाएगा।
यदि आवेदक ऐसे अधिकरण के समक्ष केस हार जाता है, तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है और यदि आवश्यक हो तो उच्चतम न्यायालय में भी जा सकता है।
कोई ऐसा व्यक्ति जिसे न केवल अंतिम NRC से बाहर कर दिया गया है, बल्कि वह विदेशी ट्रिब्यूनल में भी केस हार जाता है, को गिरफ्तार किया जा सकता है और उसे डिटेंशन कैंप/शरणार्थी शिविर में भेजे जाने की संभावना भी है।
किस आधार पर दावा कर सकते हैं सूची से बाहर किये गए लोग?
ऐसे लोगों को यह साबित करने की आवश्यकता होगी कि वे या उनके पूर्वज 24 मार्च, 1971 को या उससे पहले असम के नागरिक थे। वर्ष 1985 के असम समझौते में यही निर्दिष्ट तारीख है।
वर्ष 1951 की NRC के नागरिक स्वचालित रूप से अपडेटेड NRC में शामिल होने के लिये पात्र हैं। जीवित बचे लोगों और मृतकों के वंशजों को यह सुविधा प्रदान की गई है कि वे अपनी वंशावली को साबित कर सकें। हालाँकि वर्ष 1951 की NRC के साथ संलग्नता अनिवार्य नहीं है।
असम समझौते के तहत निर्दिष्ट तिथि के अनुसार 24 मार्च, 1971 तक जो कोई भी व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल है, या ऐसे नागरिकों के वंशज हैं, वे अपडेटेड NRC में शामिल होने के पात्र हैं। दूसरे अन्य दस्तावेज़ भी स्वीकार्य हैं जैसे- जन्म प्रमाण-पत्र और भूमि रिकॉर्ड, ऐसे दस्तावेज़ जो कि निर्दिष्ट तिथि से पहले जारी किये गए थे।
यदि सूची से बाहर किये गए लोगों के लिये कानूनी सहारा भी विफल हो जाता है तो क्या उन्हें निर्वासित किया जाएगा?
हालाँकि असम आंदोलन की शुरुआत निर्वासन के मुद्दे को केंद्र में रख कर की गई थी, बांग्लादेश ने कभी भी आधिकारिक रूप से यह स्वीकार नहीं किया कि उसके किसी भी नागरिक ने अवैध रूप से असम में पलायन किया।
राज्य में मौजूदा जेलों के भीतर अवैध प्रवासियों के लिये 6 निरोध शिविर (Detention Camps) हैं और 3,000 लोगों की क्षमता वाले 7वें शिविर का निर्माण करने का प्रस्ताव है। हालाँकि इन शिविरों में सभी बहिष्कृत लोगों को समायोजित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
निर्वासित न किये जाने अथवा शरणार्थी शिविर में न भेजे जाने की स्थिति में
ये आधिकारिक तौर पर गैर-नागरिक होंगे, लेकिन इनके साथ किस प्रकार का रवैया अपनाया जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। गृह मंत्रालय के अनुसार, भारत में नागरिकताहीन (Stateless) व्यक्तियों के लिये अभी कोई निश्चित नीति नहीं है।
एकमात्र पहलू जो कम या ज़्यादा स्पष्ट तरीके से ज्ञात है, वह यह कि एक नागरिकताहीन व्यक्ति के पास मतदान का अधिकार नहीं होगा। अभी तक ऐसे लोगों के लिये रोज़गार, आवास और सरकारी स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा के उनके अधिकारों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। असम में कुछ इस प्रकार के सुझाव दिये गए हैं कि ऐसे लोगों को वर्क परमिट दिया जाए, हालाँकि कुछ वर्गों द्वारा इस विचार का विरोध भी किया जा रहा है।
क्या शरणार्थियों के लिये कोई नीति नहीं है?
नागरिकताहीन होना शरणार्थी होने जैसा नहीं है। भारत में तिब्बत, श्रीलंका (तमिल) और पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी निवास करते हैं। इनमें से केवल अंतिम समूह को लोकसभा चुनावों में मतदान का अधिकार है, हालाँकि विधानसभा चुनावों में इन्हें भी मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं है। तिब्बतियों को सरकार एक विशेष संशोधन के साथ भारतीय नागरिकता की अनुमति देती है कि वे तिब्बती बस्तियों को छोड़ दें और शरणार्थी लाभों का परित्याग कर दें। कुछ राज्यों द्वारा अंगीकृत तिब्बती पुनर्वास नीति (Tibetan Rehabilitation Policy) 2014 के तहत शरणार्थी श्रम, राशन, आवास और ऋण के लिये सरकारी योजनाओं के तहत प्रदत्त कुछ लाभों के लिये पात्र हैं।

निष्कर्ष
NRC की सूची जारी होने के बाद लोग स्टेटलेस हो गए हैं, अर्थात् वे किसी भी देश के नागरिक नहीं रहे। ऐसी स्थिति में राज्य में हिंसा का खतरा बना हुआ है। जो लोग दशकों से असम में रह रहे थे, भारतीय नागरिकता समाप्त होने के बाद वे न तो पहले की तरह वोट दे सकेंगे, न इन्हें किसी कल्याणकारी योजना का लाभ मिलेगा और अपनी ही संपत्ति पर भी इनका कोई अधिकार नहीं रहेगा।

असमिया समाज का गौरव सहनशीलता और बहुलवाद की परंपरा से भरा हुआ है, जो शंकरदेव जैसे महान पुरुष से होते हुए अजन फकीर जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के रूप में इसे सँजोए हुए है। अब देखना यह है कि इस फैसले के बाद असम का भविष्य कितना उन्नतिशील होगा

Kautilya Academy App Online Test Series